शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

= विं. त. ३२/३५ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“विंशति तरंग” ३२/३५)*
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*इन्दव छन्द -*
*चतुर्भुज जी सिद्ध बन गये -*
दास चतुर्भुज लालहिं को सुत,
यों गुरु दादुहिं शिष्य कहाई ।
छोड़ कुटुम्ब रू भाव धरयो गुरु,
भक्ति करी हरि प्रीति बढाई ॥
मंत्र लियो उर धारि जपे नित,
एक हि राम सुं ध्यान धराई ।
रामपुरे करि साधन धाम जु,
बावन शिष्यहिं नाम कहाई ॥३२॥
इस प्रकार लालाराम बनजारे का सुत श्री दादूजी का शिष्य बन गया । कुटुम्ब का मोह छोड़कर गुरुदेव के उपदेशों में श्रद्धाभाव रखने लगा । दिनों दिन उसकी भक्ति और प्रभु - प्रीति में वृद्धि होने लगी । गुरुमंत्र पाकर हृदय की गहराई से जाप करने लगा । निरन्तर राम के ध्यान में वृत्ति लग गई । फिर रामपुरा ग्राम में भजन - साधन करते हुये सिद्ध बन गये और श्री दादूजी के बावन शिष्यों में गिने गये ॥३२॥
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*पूरब चतुरभुज रामपुर राजहि ठाकुरदास जी ने एक लाख वाणी की रचना की -*
ठाकुरदास हिं दास भये शिष,
एकहि लक्ष जु बाणि बखानी ।
दादु गुरु ढिंग लाय धरी तब,
बूझत ताहिं की रचि बानी ॥
ब्रह्म विज्ञान वेदान्त बखानत -
आप कही बिरथा श्रम ठानी ।
ऐसहु भाव भये हरि में जब,
होवत जीव कल्याण सुथानी ॥३३॥
केवल कागज में लिखि राखत,
ढोवत बोझ वृथा इन जानी ।
ताल सरोवर जाय बहावहु,
ब्रह्म स्वरूप धरो उर ज्ञानी ॥
केतिक पत्र हिं बीनत संत जु,
न्हावत शेष बहे गलि पानी ।
पत्रहिं जोड करी लघु वाणिजु,
दास सुनाम रही वह बानी ॥३४॥
दोहा -
पट्टण ग्रामहिं वासकरि, ब्रह्म हिं ध्यान लगाय ।
दास भजे भगवन्त पद, गुरु किरपा फल पाय ॥३५॥
श्री दादूजी के शिष्य ठाकुरदास जी के प्रति श्रद्धा रखने वाले दास - नामक सज्जन शिष्य बन गये । उन्होंने एक लाख छन्दों में वाणी रचना की, और गुरुदेव श्री दादूजी के चरणों में लाकर रखी । और कहा - हे गुरुदेव इसमें ब्रह्मविज्ञान और वेदान्त का व्याख्यान किया गया है । इसके लिये आपकी सम्मति क्या है ? गुरुदेव ने फरमाया -
दासजी की रचना पानी में बहाना -
‘‘मसि कागद के आसरे, क्यों छूटे संसार ।
राम बिना छूटे नहीं, दादू भरम विकार ॥’’
इतनी विशाल रचना में व्यर्थ ही श्रम किया । इतना समय हरिभजन में लगाते तो कल्याण हो जाता । केवल कागद पर ब्रह्मविज्ञान लिख देने, और उसके बोझ को ढोते रहने से कल्याण नहीं होने वाला । कल्याण चाहते हो तो ब्रह्मविज्ञान को हृदय में लिखो, वहाँ धारण करो । गुरुदेव का उपदेश सुनकर दासजी ने अपनी वाणी तालाब में बहा दी । वहाँ नहाते हुये संतों ने कुछ पन्ने बीन लिये, शेष पन्ने पानी में डूब कर गल गये । संतों द्वारा बीने गये पनें में लघु वाणी विद्यमान रही । फिर दासजी ने पाटण ग्राम में विराजकर ब्रह्म - ध्यान लगाया । गुरुकृपा से उन्हें फलसिद्धि मिली । भगवद् भजन से उन्हें परमपद की प्राप्ति हुई ॥३३-३५॥
(क्रमशः)

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