#daduji
||दादूराम सत्यराम||
जे घट रोपै राम जी, सींचै अमी अघाइ ।
दादू लागै अमर फल, कबहूँ सूख न जाइ ॥ ९ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! जो उत्तम साधक, इस घट रूप अन्तःकरण में निर्गुण ब्रह्मरूप राम को धारण करेअथवा इस शरीर को अद्वैत सत्संग में रोपे, और फिर अन्तःकरण में अद्वैत नाम - चिन्तन रूप ग्राहक बहावे । फिर इस प्रकार तृप्त होने से, जीवन मुक्ति रूप अखंड फल, इस मनुष्य शरीर में प्राप्त होता है । उसका मनुष्य - जन्म फिर व्यर्थ नहीं जाता ॥ ९ ॥
दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं ।
सूखे खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥ १० ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! ‘अमर बेलि’ कहिए साधक की अन्तर्मुख वृत्ति, संसार में आसक्ति रखने वाली विषय - वासना रूपी खारे जल को पीकर आत्म - भावना की तरफ से सूख गई है । उस बुद्धिरूप बेलि के, ज्ञान अमृत रूप फल नहीं लगता है ॥ १० ॥
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