बुधवार, 17 सितंबर 2014

*सीकरी प्रसंग २७ वां दिन*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग २७ वां दिन ~*
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२७ वे दिन अकबर बादशाहग ने कहा- जिस भक्ति से प्राणि का कल्याण होता है, उस भक्ति के कितने भेद हैं ? दादूजी ने कहा- भक्ति के मुख्य तीन भेद हैं । वे हैं - १-नवधा २- प्रेमा और ३ - परा । इन को क्रम से कनिष्ठा, मध्यमा और उत्तमा भी कहते हैं । नवधा में विधि-विधान होने से उसे वैधी भी कहते हैं । उपास्य भेद से सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति भी कहते हैं । नवधा के नव भेद हैं – १- श्रवण, २-कीर्तन, ३- स्मरण, ४- पाद सेवन, ५-अर्चन, ६-वंदन, ७- दास्य, ८-सख्य और ९- आत्म निवेदन ।
१~ श्रवण-
*दादू जैसे श्रवण दोय हैं, ऐसे हौंय अपार ।*
*राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥३१८॥*
(परि. अंग ४)
२ ~ कीर्तन-
दादू श्रोता सनेही राम का, सो मुझ मिलवा आण ।
तिस आगे हरि गुण कथूं, सुनत न कर ही काण ॥९९॥
(साधु अं. १५)
३ ~ स्मरण-
एक राम की टेक गहि, दूजा सहज सुभाय ।
राम नाम छाडे नहीं, दूजा आवे जाय ॥१५॥
(स्मरण अंग २)
४ ~ पाद सेवन-
मस्तक मेरे पांव धर, मंदिर मांहीं आव ।
सइयां सोवे सेज पर, दादू चंपे पांव ॥२७४॥
(परि. अंग ४)
५ ~ अर्चन-
पद ४४० आरती । त्रिताल
इहि विधि आरती राम की कीजे, आत्मा अंतर वारणा लीजे ॥टेक॥
तन मन चन्दन प्रेम की माला, अनहद घंटा दीन दयाला ।
ज्ञान का दीपक पवन की बाती, देव निरंजन पाँचों पाती ।
आनन्द मंगल भाव की सेवा, मनसा मन्दिर आतम देवा ।
भक्ति निरन्तर मैं बलिहारी, दादू न जानै सेव तुम्हारी ।
साखी- देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढाय ।
तन मन चन्दन चरचिये, सेवा सुरति लगाय ॥२७७॥
(परि. अंग ४)
आतम मांहीं राम है, पूजा ताकी होय ॥
सेवा वंदन आरती, साधु करैं सब कोय ॥२६०॥
(परि. अंग ४)
६ ~ वंदन-
परब्रह्म परात्परं, सो मम देव निरंजनं ।
निराकरं निर्मलं, तस्य दादू वंदनं ॥२॥
(गुरु अंग १)
७ ~ दास्य-
दादू जब लग राम है, तब लग सेवा होय ।
अखंडित सेवा एकरस, दादू सेवक सोय ॥२४७॥
(परि.अंग ४)
८ ~ सख्य-
मीत तुम्हारा तुम कने, तुम ही लेहु प़िछान ।
दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥७॥
(विचार अंग १८)
९ ~ आत्म निवेदन-
तन भी तेरा मन भी तेरा, तेरा पिंड रु प्रान ।
सब कु़छ तेरा तू है मेरा, यह दादू का ज्ञान ॥२०॥
(सुं द. अंग ३०)
जिसका है तिसको चढ़े, दादू ऊरण होय ।
पहले देवे सो भला, पी़छे तो सब कोय ॥४०॥
(शूरातन अं. २४)
उक्त प्रकार नवधा का परिचय देकर सत्संग समाप्त कर दिया ।

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