🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*सीकरी प्रसंग १५/१६ वां दिन*
.
१५ वें दिन अकबर बादशाह ने पू़छा - अवतार स्वतंत्र होते हैं या परतंत्र होते हैं ?
दादूजी ने कहा -
*नूर तेज ज्यों ज्योति है, प्राण पिंड यूं होय ।*
*दृष्टि मुष्टि आवे नहीं, साहिब के वश सोय ॥१९८॥*
(परिचय अंग ४)
स्वतंत्र तो एक ईश्वर ही है ।
.
अकबर - ईश्वर कैसे रहता है ? दादूजी ने कहा -
रहै नियारा सब करे, काहूँ लिप्त न होय ।
आदि अंत भाने घड़े, ऐसा समर्थ सोय ॥३०॥
(समर्थता अंग २१)
.
अकबर - इससे तो ईश्वर को अति परिश्रम होता होगा ?
दादूजी -
श्रम नाहीं सब कु़छ करे, यूं कलिधरी बनाय ।
कौतिकहारा हो रहा, सब कु़छ होता जाय ॥३२॥
(समर्थता अंग २१)
.
अकबर - उनको रचना रूप कार्य से हर्ष शोक भी होता होगा ?
दादूजी -
बिन गुण व्यापे सब किया, समर्थ आपै आप ।
निराकर न्यारा रहै, दादू पुण्य न पाप ॥३३॥
समता के घर सहज में, दादू दुविधा नांहिं ।
सांई समर्थ सब किया, समझ देख मन मांहिं ॥३४॥
पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाय ।
हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाय ॥३५॥
(समर्थता अंग २१)
.
इतना कहकर दादूजी मौन हो गये । उक्त वचन सुनकर अकबर बादशाह, वीरबल और राजा भगवतदासादि को अति हर्ष हुआ, फिर सब बादशाह के साथ राज भवन को चले गये ।
.
सीकरी प्रसंग १६ वे दिन अकबर ने पू़छा - आप मेरा अन्न क्यों नहीं खाते है ? दादूजी ने कहा -
राजा राणा राव मैं, मैं खानों शिर खान ।
माया मोह पसारे एता, सब धरती असमान ॥२॥
(काल अंग २५)
अर्थात् राजान्न नाना प्रकार के करों का होता है । अतः हमारे साधन में विघ्न कर सकता है । इसी से नहीं खाते हैं । इस विषय पर दृष्टांत सहित लम्बा प्रवचन देने से १६ वें दिन का समय इसी में समाप्त हो गया ।
(क्रमशः)
दादूजी ने कहा -
*नूर तेज ज्यों ज्योति है, प्राण पिंड यूं होय ।*
*दृष्टि मुष्टि आवे नहीं, साहिब के वश सोय ॥१९८॥*
(परिचय अंग ४)
स्वतंत्र तो एक ईश्वर ही है ।
.
अकबर - ईश्वर कैसे रहता है ? दादूजी ने कहा -
रहै नियारा सब करे, काहूँ लिप्त न होय ।
आदि अंत भाने घड़े, ऐसा समर्थ सोय ॥३०॥
(समर्थता अंग २१)
.
अकबर - इससे तो ईश्वर को अति परिश्रम होता होगा ?
दादूजी -
श्रम नाहीं सब कु़छ करे, यूं कलिधरी बनाय ।
कौतिकहारा हो रहा, सब कु़छ होता जाय ॥३२॥
(समर्थता अंग २१)
.
अकबर - उनको रचना रूप कार्य से हर्ष शोक भी होता होगा ?
दादूजी -
बिन गुण व्यापे सब किया, समर्थ आपै आप ।
निराकर न्यारा रहै, दादू पुण्य न पाप ॥३३॥
समता के घर सहज में, दादू दुविधा नांहिं ।
सांई समर्थ सब किया, समझ देख मन मांहिं ॥३४॥
पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाय ।
हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाय ॥३५॥
(समर्थता अंग २१)
.
इतना कहकर दादूजी मौन हो गये । उक्त वचन सुनकर अकबर बादशाह, वीरबल और राजा भगवतदासादि को अति हर्ष हुआ, फिर सब बादशाह के साथ राज भवन को चले गये ।
.
सीकरी प्रसंग १६ वे दिन अकबर ने पू़छा - आप मेरा अन्न क्यों नहीं खाते है ? दादूजी ने कहा -
राजा राणा राव मैं, मैं खानों शिर खान ।
माया मोह पसारे एता, सब धरती असमान ॥२॥
(काल अंग २५)
अर्थात् राजान्न नाना प्रकार के करों का होता है । अतः हमारे साधन में विघ्न कर सकता है । इसी से नहीं खाते हैं । इस विषय पर दृष्टांत सहित लम्बा प्रवचन देने से १६ वें दिन का समय इसी में समाप्त हो गया ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें