रविवार, 21 सितंबर 2014

१०. दुष्ट को अंग ~ ५

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१०. दुष्ट को अंग*
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*सर्प डसै सु नहीं कछु तालक,*
*विछु लगै सु भलौ करि मांनौ ।* 
*सिंह हु खाइ तौ नाहिं कछू डर,* 
*जौ गज मारत तौ नहिं हांनौ ॥* 
*आगि जरौ, जल बुड़ी मरौ,* 
*गिरि जाइ गिरौ, कछु भै मति आंनौ ।* 
*सुन्दर और भले सब ही दुख,* 
*दुर्जन संग भलौ जिनि जांनौ ॥५॥* 
॥ इति दुष्ट को अंग ॥१०॥ 
*दुष्ट संग जिन देइ विधाता* : किसी को साँप डँस ले, कोई चिन्ता की बात नहीं । किसी को बिच्छू काट ले, उससे भी भला होगा – ऐसा मान लो । 
सिंह खा डाले, उसका भी कोई भय नहीं । हाथी अपने पैरों से कुचल दे, तो भी कोई हानि नहीं । 
कोई अग्नि में जल जाय, या जल में डूब मरे, पहाड़ से गिर पड़े तो भी कोई भय नहीं मानना चाहिये । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं – परमात्मा भले ही अन्य कोई भी बड़े से बड़ा संकट(दुःख) हमको दे, उसे हम सहन कर लेंगे, परन्तु किसी दुष्ट का संग हमें कभी न मिले – इसी में हमारा हित है ॥५॥ 
॥ दुष्ट का अंग सम्पन्न ॥१०॥
(क्रमशः)

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