॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१०. दुष्ट को अंग*
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*सर्प डसै सु नहीं कछु तालक,*
*विछु लगै सु भलौ करि मांनौ ।*
*सिंह हु खाइ तौ नाहिं कछू डर,*
*जौ गज मारत तौ नहिं हांनौ ॥*
*आगि जरौ, जल बुड़ी मरौ,*
*गिरि जाइ गिरौ, कछु भै मति आंनौ ।*
*सुन्दर और भले सब ही दुख,*
*दुर्जन संग भलौ जिनि जांनौ ॥५॥*
॥ इति दुष्ट को अंग ॥१०॥
*दुष्ट संग जिन देइ विधाता* : किसी को साँप डँस ले, कोई चिन्ता की बात नहीं । किसी को बिच्छू काट ले, उससे भी भला होगा – ऐसा मान लो ।
सिंह खा डाले, उसका भी कोई भय नहीं । हाथी अपने पैरों से कुचल दे, तो भी कोई हानि नहीं ।
कोई अग्नि में जल जाय, या जल में डूब मरे, पहाड़ से गिर पड़े तो भी कोई भय नहीं मानना चाहिये ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं – परमात्मा भले ही अन्य कोई भी बड़े से बड़ा संकट(दुःख) हमको दे, उसे हम सहन कर लेंगे, परन्तु किसी दुष्ट का संग हमें कभी न मिले – इसी में हमारा हित है ॥५॥
॥ दुष्ट का अंग सम्पन्न ॥१०॥
(क्रमशः)

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