रविवार, 21 सितंबर 2014

*सीकरी प्रसंग ३६ वां दिन*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग ३६ वां दिन -*
३६ वें दिन अकबर बादशाह ने कहा - स्वामिन् ! आप तो समर्थ है अतः मुझे वर दें कि मेरे कुल में जन्मा हुआ कोई भी दोज़ख में नहीं जाय, सब विहिश्त में ही जायें और मेरे कुल का राज्य दिल्ली में अटल रहे ।
दादूजी ने कहा -
अपने अमलों छूटिये, काहू के नांहि ।
सोई पीड़ पुकारसी, जा दूखे मांहीं ॥३३॥
फूटी नाव समुद्र में, सब डूबण लागे ।
अपना - अपना जीव लें, सब कोई भागे ॥३५॥
दादू शिर शिर लागी आपणे, कहु कौन बुझावे ।
अपणा अपणा साँच दे, सांई को भावे ॥३६॥
(सांच अंग १३)
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दूसरे तुमने दिल्ली में अटल राज्य रहने को कहा सो भी कैसे हो सकता है ? अटल तो महापुरुषों के शरीर भी नहीं रहते राज्य कैसे रहेगा ?
दादू कहां सु मुहम्मद मीर था, सब नवियों सिरताज ।
सो भी मर माटी हुआ, अमर अलह का राज ॥८३॥
केते मर माटी भये, बहुत बड़े बलवन्त ।
दादू केते हो गये, दाना देव अनन्त ॥८४॥
(काल अंग २५)
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इत्यादि साखियों द्वारा उपदेश सुनकर अकबर बादशाह ने कहा - आप तो समर्थ हैं, अतः कु़छ तो आशीर्वाद देने की कृपा करें ।
दादूजी ने कहा -
ज्यों रचिया त्यूं होयगा, काहे को शिर लेय ।
साहिब उपर राखिये, देख तमासा येह ॥४८॥
सहजैं सहजैं होयगा, जे कु़छ रचिया राम ।
काहे को कल्पे मरे, दुखी होत बेकाम ॥२॥
सांई किया सो हो रह्या जे कु़छ करे सो होय ।
करता करे सो होत है, काहे कल्पे कोय ॥३॥
(विश्वास अंग १९)
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इत्यादिक साखियों का उपदेश सुनकर भी अकबर बादशाह का मन निष्काम नहीं हुआ तब दादू जी ने कहा -
दादू तन मन लायकर, सेवा दृढ़ कर लेय ।
ऐसा समर्थ आप है, जे माँगे सो देय ॥२८॥
(समर्थता अंग २१)
फिर भी उत्तम भक्त तो प्रभु से कु़छ भी नहीं माँगते हैं, कनिष्ट ही माँगते हैं ।
फल कारण सेवा करे, याचे त्रिभुवन राव ।
दादू सो सेवक नहीं, खेले अपणा दाँव ॥९१॥
(निष्कामी पतिव्रता अंग ८)
इत्यादिक साखियों द्वारा उपदेश किया तब तक सत्संग का समय समाप्त हो गया । फिर अकबर आदि सभी प्रणाम करके चले गये ।

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