गुरुवार, 4 सितंबर 2014

= ८४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
यहु परिख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नांहि । 
अन्तर की जाणैं नहीं, ता तैं खोटा खांहि ॥ 
दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ । 
बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 
अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे । 
दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥ 
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साभार : बिष्णु देव चंद्रवंशी ~ 
---●●●|| चरित्र ही हमारा समग्र व्यक्तित्व है ||●●●--- 

दूरतः शोभते मूर्खो लम्बवत शटाक -वृत्ता । 
तावत शोभते मूर्खो यावत् किंचित न भाषते॥ ' 
अर्थात किसी सभा में सज-धज कर बैठा मूर्ख भी दूर से देखने पर बहुत सुंदर दिखाई देते हैं । किंतु वह तभी तक सुंदर दीखते हैं जब तक कुछ बोलने के लिए वे अपना मुख नहीं खोलते, जैसे ही किसी विषय पर राय जाहिर करने के लिए अपना मुख खोलते हैं, उनकी मूर्खता पकड़ी जाती है। क्योंकि इस प्रकार की कोई भी, वाचिक या व्यवहारिक अभिव्यक्ति हमारे आंतरिक व्यक्तित्व की कलई खोल ही देती है। हमारे बोलने, विचारने या आचरण से हमारे यथार्थ व्यक्तित्व का भंडाफोड़ तो हो ही जाता है। "चरित्र" ही हमारा समग्र "व्यक्तित्व" है।

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