॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*७. विश्वास का अंग*
.
*खेचर भूचर जे जल के चर,*
*देत अहार चराचर पोखैं ।*
*वे हरि जू सब कौं प्रतिपालत,*
*जो जिंहिं भांति तिसी बिधि तोखैं ॥*
*तूं अब क्यौं बिसवास न राखत,*
*भूलत है कत धोखै ही धोखैं ।*
*तोहि तहां पहुंचाइ रहै प्रभु,*
*सुन्दर बैठि रहै किन ओखैं ॥७॥*
जितने भी आकाशचारी(पक्षी), पृथ्वीवासी(प्राणी) एवं जल में रहने वाले(मत्स्य आदि) जीव हैं इन सब को वह प्रभु ही भोजन देता हुआ इस समस्त चराचर जगत् की रक्षा कर रहा है ।
वे हरि ही इस समस्त जगत् का योगक्षेम वहन करते हैं । जो प्राणी जिस प्रकार रह कर सुख मानता है वह प्रभु उस को उसी प्रकार की व्यवस्था कर सन्तुष्ट कर देता है ।
तूँ अब भी धोखे मैं हैं । तूँ उस पर विश्वास क्यों नहीं रखता, क्यों भूला हुआ इधर उधर फिर रह है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वह प्रभु तेरी रक्षा के लिये उचित सामग्री तेरे पास अवश्य पहुँचायगा, भले ही तूँ कितने ही दूर गुप्त स्थान में जाकर बैठा रह ॥७॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें