गुरुवार, 4 सितंबर 2014

७. विश्वास का अंग ~ ७

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*७. विश्वास का अंग* 
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*खेचर भूचर जे जल के चर,*
*देत अहार चराचर पोखैं ।* 
*वे हरि जू सब कौं प्रतिपालत,* 
*जो जिंहिं भांति तिसी बिधि तोखैं ॥* 
*तूं अब क्यौं बिसवास न राखत,* 
*भूलत है कत धोखै ही धोखैं ।* 
*तोहि तहां पहुंचाइ रहै प्रभु,* 
*सुन्दर बैठि रहै किन ओखैं ॥७॥* 
जितने भी आकाशचारी(पक्षी), पृथ्वीवासी(प्राणी) एवं जल में रहने वाले(मत्स्य आदि) जीव हैं इन सब को वह प्रभु ही भोजन देता हुआ इस समस्त चराचर जगत् की रक्षा कर रहा है । 
वे हरि ही इस समस्त जगत् का योगक्षेम वहन करते हैं । जो प्राणी जिस प्रकार रह कर सुख मानता है वह प्रभु उस को उसी प्रकार की व्यवस्था कर सन्तुष्ट कर देता है । 
तूँ अब भी धोखे मैं हैं । तूँ उस पर विश्वास क्यों नहीं रखता, क्यों भूला हुआ इधर उधर फिर रह है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वह प्रभु तेरी रक्षा के लिये उचित सामग्री तेरे पास अवश्य पहुँचायगा, भले ही तूँ कितने ही दूर गुप्त स्थान में जाकर बैठा रह ॥७॥
(क्रमशः)

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