शनिवार, 20 सितंबर 2014

*सीकरी प्रसंग ३५ वां दिन*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सीकरी प्रसंग ३५ वां दिन -*
३५ वें दिन अकबर बादशाह ने दादूजी से पू़छा - भगवन् ! सब संपूर्ण सुख चाहते हैं, दुःख कोई भी नहीं चाहता फिर भी दुःख क्यों आता है ? उक्त प्रश्‍न सुनकर दादूजी बोले -
*दादू राहु गिले ज्यूं चंद को, गहण गिले ज्यूं सूर ।*
*कर्म गिले यू जीव को, नख शिख लागे पूर ॥५७॥*
(माया अंग १२)
अर्थात् चंद्र और सूर्य को ग्रहण का दुःख लगता है, उसमें चन्द्र सूर्य ही कारण हैं, वैसे ही जीव को अपने दुःखों में कारण है अर्थात् अपना किया हुआ ही पाता है ।
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फिर अकबर ने पू़छा - भगवन् ! दुःख नष्ट होकर जीव को परमसुख कब होता है ? दादूजी बोले -
चंद गिले जब राहु को, गहण गिले जब सूर ।
जीव गिले जब कर्म को, राम रह्या भरपूर ॥४५॥
(माया अंग १२)
अर्थात् चन्द्र सूर्य अपना तेज बढ़ाकर राहु केतु की शक्ति क्षीण करते हैं, वैसे ही ज़ीव ब्रह्मज्ञान द्वारा संपूर्ण संचित कर्मो को नष्ट कर देता है और कर्म आत्मा के नहीं मानता तब वह रमता राम परब्रह्म में मिलकर सुख स्वरूप से ही अपना अनुभव करता है ।
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फिर अकबर ने पू़छा - जीव किसे कहते है ? और ब्रह्म किसे कहते हैं ?
दादूजी ने कहा -
कर्मों के वश जीव है, कर्म रहित सो बह्म ।
जहँ आतम तहँ परमात्मा, दादू भागा भर्म ॥१८॥
काचा उ़छले ऊफणे, काया हाँडी मांहि ।
दादू पाका मिल रहे, जीव ब्रह्म दो नांहिं ॥१९॥
(पारिख अंग २७)
फिर अकबर ने पू़छा - भगवन् ! जीव को ब्रह्म बनाने वाला ज्ञान कैसा होता है और उसका साधन क्या है ? दादूजी बोले -
जीव ब्रह्म सेवा करे, ब्रह्म बराबर होय ।
दादू जाणे ब्रह्म को, ब्रह्म सरीखा सोय ॥८॥
(हैरान अंग ६)
दादू जल में गगन, गगन में जल है पुनि वह गगन निरालं ।
ब्रह्म जीव इहिं विधि रहै, ऐसा भेद विचारं ॥२॥
ज्यूं दर्पण में मुख देखिये, पाणी में प्रतिबिम्ब ।
ऐते आतमराम हैं, दादू सब ही संग ॥३॥
मीत तुम्हारा तुम कनै, तुमही लेहु पिछान ।
दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥८॥
(विचार अंग १८)
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उक्त उपदेश सुनकर अकबर ने पू़छा - स्वामिन् ! आपने कहा था जीव ब्रह्म की सेवा करता है तब ब्रह्म के बराबर हो जाता है । सो सेवा कौनसी है ? बताइये । दादूजी ने कहा -
दादू नीका नाम है, सो तू हिरदै राखि ।
पाखंड प्रपंच दूर कर, सुन साधुजन की साखि ॥७॥
निमष न न्यारा कीजिये, अन्तर तैं उर नाम ।
कोटि पतित पावन भये, केवल कहता राम ॥२५॥
ब्रह्म भक्ति जब ऊपजे, तब माया भक्ति विलाय ।
दादू निर्मल मल गया, ज्यूं रवि तिमिर नशाय ॥६४॥
दादू सब सुख स्वर्ग पयाल के, तोल तराजू बाहि ।
हरि सुख एक पलक का, ता सम कह्या न जाहि ॥८०॥
निगम हि अगम विचारिये, तउ पार न पावे ।
तातैं सेवक क्या करे, सुमिरण ल्यौं लावे ॥८७॥
(स्मरण अंग २)
दादूजी का उक्त उपदेश सुनकर अकबर बादशाह, वीरबल, आमेर नरेश भगवत्दास आदि अति प्रसन्न हुये । फिर सत्संग का समय समाप्त हो गया । अतः प्रणाम करके चले गये ।

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