#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम ।
कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥
दादू औसर जीव तैं, कह्या न केवल राम ।
अंत काल हम कहेंगे, जम बैरी सौं काम ॥
दादू ऐसे महँगे मोल का, एक सांस जे जाइ ।
चौदह लोक समान सो, काहे रेत मिलाइ ॥
सोई सांस सुजाण नर, सांई सेती लाइ ।
कर साटा सिरजनहार सौं, महँगे मोल बिकाइ ॥
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साभार : Kripa Shankar B
जब हृदय शांत और और आज्ञा चक्र जागृत होने लगता है तभी चित्त की वृत्तियों का निरोध होना आरम्भ होने लगता है| चित्त स्वयं को दो रूपों ------ श्वास-प्रश्वास और वासनाओं के रूप में व्यक्त करता है|
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वासनाएँ तो अति सूक्ष्म हैं जो पकड़ में नहीं आतीं, अतः ध्यान साधना का आरम्भ श्वास-प्रश्वास से होता है| श्वास-प्रश्वास पर ध्यान करते करते प्राण भी स्थिर होने लगते हैं और मन की वासनाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि चंचल प्राण ही मन है| भौतिक देह और मन के बीच की कड़ी भी प्राण ही है|
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यह मार्ग सिर्फ उन पथिकों के लिए है जिन्हें प्रभु से परम प्रेम हैं और जिनके ह्रदय में एक गहन अभीप्सा है उन्हें उपलब्ध होने की| ऐसे पथिक ही टिक पते हैं इस मार्ग पर, अन्य सब भटक जाते हैं| जब ह्रदय में एक अभीप्सा यानि तड़फ होती है प्रभु को पाने की तो प्रभु एक सद्गुरु के रूप में स्वयं ही आ जाते हैं|
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यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा ये सब साथ साथ चलते हैं| प्रभु के प्रति तड़फ यदि बहुत गहरी हो अपने आप ही ये सब पीछे पीछे चलने लगते हैं|
प्रभु के प्रति प्रेम बहुत अधिक गहन हो तो ध्यान भी स्वयं होने लगता है| तब प्रभु ही आपको अपना उपकरण बना कर सब कुछ स्वयं करने लगते हैं| तब आप कर्ता नहीं रहते|
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प्रथम अंतिम और एकमात्र आवश्यकता है प्रभु प्रेम की| बाकि सब गौण है|
आप में हृदयस्थ भगवान नारायण को नमन करते मैं आप सब के प्रति अपना अहैतुकी प्रेम और शुभ कामनाएँ व्यक्त करता हूँ| आप सब को मेरा प्रणाम| ॐ तत्सत्|
जयतु वैदिकीसंस्कृतिः जयतु भारतम् |

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