रविवार, 14 सितंबर 2014

८ . देहमलीनता व गर्बप्रहार को अंग ~ ३

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*८. देहमलीनता व गर्बप्रहार को अंग*
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*॥ इन्दव छन्द ॥*
*हाड कौ पिंजर चाम मढ्यौ सब,* 
*मांहि भर्यो मल मूत्र बिकारा ।* 
*थूक रु लार परै मुख तैं पुनि,* 
*व्याधि बहै सब और हु द्वारा ॥* 
*मांस को जीभ सौं खाइ सबै कछु,* 
*ताहि तैं ताकौं है कौंन बिचारा ।* 
*ऐसे शरीर मैं पैसि कै सुन्दर,* 
*कैसैक कीजिये सुच्य अचारा ॥३॥* 
*मलिन देह की कैसी शुद्धि* : यह शरीर वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी हड्डियों के पिंजरे पर चर्म लपेट दिया हो । 
इसमें मुख से थूक एवं लाला(लार) बह रही है और इसी प्रकार इसके अन्य द्वारों से नाना प्रकार के रोग बहते दिखायी दे रहे हैं । 
इसमें बनी हुई जिह्वा मांस की है, जिससे सब कुछ खाया पीया जाता है, इस पर किसी को कोई(शुद्धि का) विचार नहीं होता । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते पूछ्ते हैं – ऐसे अशुद्ध(मलिन एवं अपवित्र) शरीर में प्रविष्ट होकर कौन बुद्धिमान शुद्धि(शुचिता) एवं आचार – विचार का ध्यान रख सकता है ॥३॥
(क्रमशः)

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