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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**सीकरी प्रसंग २३ वां दिन**
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२३ वें दिन अकबर ने पू़छा - स्वामिन् ! आपने गत दिन मन का आसन शब्द बताया था, वह शब्द कौनसा है ? दादूजी ने कहा -
आदि शब्द ओंकार है, बोले सब घट मांहि ।
दादू माया विस्तरी, परम तत्व यहु नांहिं ॥१२॥
ओेंकार से ऊपजे, बिनशै बहुत विकार ।
भाव - भक्ति से स्थिर रहै, दादू आतम सार ॥७॥
ओंकार से ऊपजे, अरस - परस संयोग ।
अंकूर बीज द्वै पाप पुण्य इहि विधि योग रु भोग ॥६॥
पहले किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार ।
ओंकार तैं ऊपजे, पंच तत्व आकार ॥८॥
पंच तत्व से घट भया, बहु विध सब विस्तार ।
दादू घटतैं ऊपजे, मैं तै वर्ण विचार ॥९॥
निरंजन निराकार है, ओंकार आकार ।
दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥११॥
(शब्द अंग २२)
इत्यादि साखियों ओंकार से का पूरा परिचय देकर सत्संग समाप्त कर दिया ।

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