सोमवार, 15 सितंबर 2014

८ . देहमलीनता व गर्बप्रहार को अंग ~ ४

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*८. देहमलीनता व गर्बप्रहार को अंग*
.
*थूक रु लार भर्यौ मुख दीसत,*
*आंखि मैं गीड रु नांक मैं सेढ़ौ ।* 
*औरऊ द्वार मलीन रहै नित,*
*हाड के माँस के भीतर भेढ़ौ ॥* 
*ऐसै शरीर में बास कियौ तब,*
*एक से दीसत बांभन ढ़ेढ़ौ ।* 
*सुन्दर गर्व कहा इतने पर,*
*काहे कौं तूं नर चालत टेढ़ौ ॥४॥* 
हमारा यह मुख थूक एवं लाला से भरा हुआ दिखायी देता है । आँख के कोण में गीड़(गाड़ा सफ़ेद मैल) एवं नाक में सिणक(शिन्घाणक) भरा हुआ है । 
इसी तरह इस शरीर के अन्य छिद्र भी मैले ही दिख रहे हैं । इसके अन्दर हड्डी एवं मांस में चर्बी भरी पड़ी है । 
ऐसे मलिन और अशुद्ध शरीर में वास करने पर ब्राह्मण एवं चाण्डाल - दोनों एक समान ही दिखायी देते हैं । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - ऐसे मलिन एवं अशुद्ध शरीर पर अभिमान करता हुआ तूं गर्वपूर्वक टेढ़ा टेढ़ा चल रहा है - यह तो तेरे लिये लज्जा की ही बात होनी चाहिये ॥४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें