शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

= विं. त. १७/१८ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“विंशति तरंग” १७/१८)*
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*यह सूत का प्रसंग आमेर का है सौकियों कि लड़की थी*
भिक्षहिं लेवन कूं जगराम जु, 
दौसहिं ग्राम गये जु सुजाना ।
कातत सूत जु माइ कुं देखत, 
मालहिं पोवन की मन ठाना ॥ 
जग्गा तभी सतराम सुनावत, 
सूतहिं दे अरु पूत हिं पाना ।
माइ दई तब होय प्रसन्न जु, 
संत जगा गुरु के अरपाना ॥१७॥ 
शिष्य जगरामजी भिक्षा लेने हेतु दौसा ग्राम में गये । वहाँ एक माई को सूत कातते हुये देखा, और मन में विचार किया कि - माला का सूत पुराना होकर गल गया है, क्यों न इस माई से सूत लेकर अपनी माला को नये सूत में पिरो लू । फिर माई के पास जाकर सत्यराम सुनाया और बोले - ‘‘दे माई सूत, पा ले पूत’’ । माई ने प्रसन्न होकर तत्काल संत जग्गाजी को सूत दे दिया । भिक्षा लेकर जगरामजी गुरु सेवा में आये, और वह सूत भी गुरुदेव को अर्पण किया ॥१७॥ 
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अन्तरयामि दयालु लखी तब, 
भाषि कहे जगराम ठगाई ।
नाहिं भये सुत माई कहे तब, 
संत हिं वाचक झूठ कहाई ।
छोड़ि शरीर कुं जन्महु तां सुत, 
जग्गा कहे गुरु याद रखाई ।
देह तजी जगराम भये सुत, 
सुन्दर नाम धराय सुहाई ॥१८॥ 
अन्तर्यामी संत श्री दादूजी उस सूत को देखकर बोले - जग्गाजी ! आज तो ठगा आये । उस माई के भाग्य में तो पुत्र लिखा ही नही । है, और तुम सूत्र के बदले पुत्र का वचन दे आये । अब यदि उसके पुत्र नहीं हुआ, तो संत वचन झूठे हो जायेंगे, और झूठ के पाप से सारी तपस्या क्षीण हो जावेगी । अत: अपना यह शरीर छोड़कर उस माई के पुत्ररूप में जन्म लेओ । तब जग्गाजी ने कहा - जो आज्ञा गुरुदेव ! किन्तु आप मुझे भुलाना नहीं, याद करके अपनी शरण में ले लेना । संत जग्गाजी ने अपनी देह योगशक्ति से तत्काल त्याग दी, और उस माई के पुत्र रूप में जन्म ले लिया । यही बालक आगे जाकर सुन्दरदास नाम से विख्यात हुआ ॥१८॥
(क्रमशः)

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