रविवार, 14 सितंबर 2014

= विं. त. ३९/४२ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“विंशति तरंग” ३९/४२)*
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*ओला - श्री गुरु कमण्डलु झारी माहात्म्य -* 
दादु दयालुहिं झारि महागुण, 
संत सभी गुणगान किया । 
पूरब सिद्धि जु अम्बपुरी मधि, 
गलता संत पचीस थया ॥ 
पंथ मिलावन में कहि आप सुं, 
झारि भरावन ज्वाब दिया । 
यों सुनि संत उठे जल पूरन, 
डारत डारत हार गया ॥३९॥
पात्र भरयो नहिं होत अचम्भजु, 
वे सब आपनु स्थान गया । 
दूसर आल्हण दी परसाद जु, 
तां उर आतम ज्ञान भया ॥ 
तीसर भूमि मरू मग चालत, 
संत रु सेवक नीर पिया । 
चौथहिं गूठल ग्राम गऊ सब, 
तार दई मुख नीर दिया ॥४०॥ 
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पंचम भूत पिशाच उधारत, 
ईडव ओर कल्याण किया । 
षष्ठ हु शाह अकैंबर देखत, 
मालिक दर्श कटोरि लिया ॥ 
सात हुं मोरेड़े कूप सुधाजल, 
आठहुँ खोल गरीब पिया । 
गुप्त किया पुनि स्वामि तहाँ जल, 
आवत जीव हतैं दुखिया ॥४१॥ 
*गुरुदेव के कमण्डलू जल का माहात्म्य -* 
श्री दादूजी के कमण्डलु जल का प्रभाव देखकर सभी संतों ने गुणगान किया । इस झारी जल की पहली सिद्धि संतों ने आमेर में देखी । गलता आश्रम से आये पच्चीस संतों को श्री दादूजी ने अपना कमण्डलु भर देने को कहा, किन्तु वे सब मिलकर भी नहीं भर सके, और अपने सम्प्रदाय में मिलाने का संकल्प छोड़कर चले गये । 
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दूसरी बार जलसिद्धि आल्हणभक्त को प्रसाद रूप में पिलाने पर देखी । जल - प्रसाद पीकर उसके हृदय में आत्मज्ञान का प्रकाश हुआ । तीसरी बार मरुभूमि में पंथ चलते हुये संतों और सेवकों ने जल पिलाकर प्यास मिटाई । चौथी सिद्धि गुठले ग्राम में गो - उद्धारण के समय देखी । गोमुख में कमण्डलु का जल डालने से उनका उद्धार हो गया । 
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पाँचवी सिद्धि कल्याणपुरी और ईड़वा ग्राम में जल के छींटे देने से भूत - पिशाच को सद्गति प्रदान करते समय देखी । छठी सिद्धि अकबर बादशाह को कटोरे में प्रभु दर्शन कराते समय देखी । सातवीं बार जलसिद्धि का चमत्कार मोरड़ा ग्राम मे कूप - जल को मधुर करने से देखी । आठवीं बार भयहरण पर्वत की कन्दरा में गरीबदास ने जल - निर्झर बहाने से देखी । कमण्डलु जल से प्रवाहित उस निर्झर को श्री दादूजी ने तत्पश्‍चात् गुप्त कर दिया, क्योंकि निर्झर से आकर्षित जीवों की शिकारी लोग हत्यायें करते, पापाचार होता ॥३९-४१॥ 
*दोहा -* 
सुनि देखी सबही कही, संत कथा सत जान । 
माधवदास विचार करि, तरंग बीस प्रमान ॥४२॥
माधवदास कहते हैं कि - समर्थ संत श्री दादूजी की चमत्कारी ये सब लीलायें कुछ तो मैंने प्रत्यक्ष देखी हैं, तथा कुछ संतों के मुख से सुनकर लिखी है । इन्हें सत्य जाने, जो संतों की महिमा और सामर्थ्य को पहिचानते हैं, वे ही विचार करके विश्‍वास कर सकते है ॥४२॥ 
इति माधवदास विरचित श्री संतगुण सागरामृत रामत लीला निरूपण 
॥ इति विंशति तरंग सम्पूर्ण ॥२०
(क्रमशः)

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