शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

८ . देहमलीनता व गर्बप्रहार को अंग ~ १

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*८ . देहमलीनता व गर्बप्रहार को अंग*
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*मनहर छन्द -* 
*देह तौ मलीन अति बहुत विकार भरे,* 
*ताहू मांहि जरा व्याधि सब दुख रासी है ।* 
*कबहूंक पेट पीर कबहूंक सिर वाहि,* 
*कबहूंक आंखि कांन मुख में विथा सी है ॥* 
*औरऊ अनेक रोग नख सिख पूरि रहे,* 
*कबहूंक स्वास चले कबहूंक खांसी है ।* 
*ऐसौ या शरीर ताहि आपुनौं के मांनत है,* 
*सुन्दर कहत यामैं कौंन सुखवासी है ॥१॥* 
*मलिन देह का क्या अभिमान* : तेरी देह अतिशय मलिन है तथा अत्यधिक दोषों से युक्त है । इस में समय आने पर बुढापा एवं विविध प्रकार के रोग भी प्रवेश करते रहते हैं । अतः यह सब दुःखों का समूह है । 
कभी पेट में और कभी शिर में पीड़ा होती है, कभी हाथ में या कभी आँख एवं मुख में कोई वेदना हुई रहती है । 
इसी प्रकार के अन्य अनेक रोग भी इस में, नख से चोटी तक, लगे ही रहते हैं । कभी श्वास रोग हो जाता है या कभी कफरोग(खांसी) हो जाता है । ऐसे रोगग्रस्त शरीर को तूँ अपना मानता है(ममत्व रखता है) *श्री सुन्दरदास जी* पूछते हैं - इसमें कौन सा सुख तुझे दिखायी दे रहा है ॥१॥
(क्रमशः)

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