#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*८ . देहमलीनता व गर्बप्रहार को अंग*
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*मनहर छन्द -*
*देह तौ मलीन अति बहुत विकार भरे,*
*ताहू मांहि जरा व्याधि सब दुख रासी है ।*
*कबहूंक पेट पीर कबहूंक सिर वाहि,*
*कबहूंक आंखि कांन मुख में विथा सी है ॥*
*औरऊ अनेक रोग नख सिख पूरि रहे,*
*कबहूंक स्वास चले कबहूंक खांसी है ।*
*ऐसौ या शरीर ताहि आपुनौं के मांनत है,*
*सुन्दर कहत यामैं कौंन सुखवासी है ॥१॥*
*मलिन देह का क्या अभिमान* : तेरी देह अतिशय मलिन है तथा अत्यधिक दोषों से युक्त है । इस में समय आने पर बुढापा एवं विविध प्रकार के रोग भी प्रवेश करते रहते हैं । अतः यह सब दुःखों का समूह है ।
कभी पेट में और कभी शिर में पीड़ा होती है, कभी हाथ में या कभी आँख एवं मुख में कोई वेदना हुई रहती है ।
इसी प्रकार के अन्य अनेक रोग भी इस में, नख से चोटी तक, लगे ही रहते हैं । कभी श्वास रोग हो जाता है या कभी कफरोग(खांसी) हो जाता है । ऐसे रोगग्रस्त शरीर को तूँ अपना मानता है(ममत्व रखता है) *श्री सुन्दरदास जी* पूछते हैं - इसमें कौन सा सुख तुझे दिखायी दे रहा है ॥१॥
(क्रमशः)

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