मंगलवार, 16 सितंबर 2014

= बेली का अंग ३६(१३/१४) =

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टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*बेली का अंग ३६*
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*अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ ।*
*अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥१३॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! अन्तर्मुख विवेक - बुद्धि रूप बेली को, निष्काम भक्ति में लगाइये, तो फिर उस बुद्धि रूप बेली के ज्ञानरूपी अमृत फल लगेगा । उसको भक्षण करने वाले उत्तम साधक, न तो कोई मरे हैं और न आगे मरेंगे । जीवन - मुक्त हो जावेंगे ॥१३॥
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*दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ ।*
*विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! बहिर्मुख बुद्धि रूप बेली कुसंग में लगी हुई है तो विषय रूपी जल को पीने से चौरासी में जीव जाते हैं । फिर चौरासी के दुःखों को भोगते रहते हैं । ऐसे जीव कलियुग में कभी भी अमर नहीं होते ॥१४॥
(क्रमशः)

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