शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

७. विश्वास का अंग ~ ८

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*७. विश्वास का अंग* 
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*मनहर छन्द -*
*काहै कौं बघूरा भयौ फिरत अज्ञानी नर,* 
*तेरै तो रिजक तेरै घर बैठे आइ है ।* 
*भावै तूं सुमेर जाहि भावै जाहि मारू देश,* 
*जितनौक भाग लिख्यौ तितनौक पाइ है ॥* 
*कूप मांझ भरि भावै सागर कै तीर भरि,* 
*जितनौंक भांडौ, नीर तितनौं समाइ है ।* 
*ताहि तैं संतोष करि सुन्दर बेसास धरि,* 
*जितनो रच्यौ है घट सोइ जू भराई है ॥८॥* 
रे अज्ञानी पुरुष ! तूँ वात्याचक्र(बवंडर) के समान इधर उधर व्यर्थ ही चक्कर काट रहा है । तेरा योगक्षेम तो तेरे भगवान् तेरे पास ही पहुँचा देंगे । (योगक्षेमं वहाम्यहम्) 
भले ही तूँ सुमेरु पर्वत पर जा बैठ, या मरू प्रदेश के रेतीले टीबों(पहाड़ों) में छिप कर बैठा रह; तेरे भाग्य में जितना लिखा है, उतना वहाँ भी तेरे पास पहुँच ही जायगा । 
उदाहरण के रूप में यह समझ ले कि भले ही तूँ किसी कूए पर जा, या समुद्र के किनारे पहुँच जा, तूँ दोनों ही स्थानों से उतना ही जल पा सकेगा जितना बड़ा तेरे पास घड़ा(जल-पात्र) है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - अतः हे पामर प्राणी ! तूँ कितना भी प्रयास कर ले, तेरे पात्र में उतना ही जल समायगा जितना उसका छोटा या बड़ा आकार है, अतः तूँ उतने से ही सन्तोष कर ॥८॥
(क्रमशः)

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