बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

= एक विं. त. ३३/३४ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” ३३/३४)*
*कथा सत्संग नित्य होता -* 
भूप नरायण सेव करे बहु, 
लाय पदारथ धाम धराये । 
एक भण्डार बनाय सुसज्जित, 
केशवदास भंडारि रखाये । 
आगत संत रु सेवक पावत, 
अन्न प्रसाद रु वस्त्र सुभाये । 
होवत संतकथा नित निर्मल, 
ब्रह्महि धामजु दादु रहाये ॥३३॥ 
भूप नारायणसिंह भी अतीव श्रद्धा से गुरुदेव और संतों की सेवा में तत्पर रहते । संतों की आवश्यकतानुसार विविध पदार्थ सामग्री लाकर संत धाम में रखवाता रहता । उद्यान के समीप एक भण्डार का भी निर्माण कराया गया, जिसकी व्यवस्था का भार शिष्य केशवदास जी को सौंपा गया । इस दादू भण्डार में आगत संत सेवक नित्य अन्न प्रसाद पाते रहते । संतों को वस्त्रादि अन्य सामग्री भी इसी भण्डार से उपलब्ध होती थी । नित्य संत सभा में कथा कीर्तन सत्संग होता रहता । इस तरह ब्रह्मधाम में श्रीदादूजी विराजने लगे ॥३३॥ 
*ब्रह्म धाम में श्रीदादूजी की महिमा -* 
संत सुथान सुनाम उजागर, 
दादुहि द्वार उचार करे हैं । 
सम्परदाय सबै भय मानत, 
संत प्रतापहिं देखि डरे हैं । 
दूर रहें खल, तेज तपोबल, 
भक्तन्ह के सब ताप हरे हैं । 
माधवदास दिये गुरु दादुजि, 
एक अद्वैत उपासि खरे हैं ॥३४॥ 
संतों की महिमा चारों तरफ फैलने लगी । लोक - समुदाय ब्रह्म धाम को दादूद्वारा भी कहने लगे । अन्य विद्वेषी सम्प्रदायी श्रीदादूजी के तप प्रताप से डरते रहते । संतों के तपोबल के कारण खल दूर - दूर ही रहते । श्रीदादूजी की कृपा से भक्त संत सेवकों के सब सन्ताप दूर ही रहते । माधवदास कहते हैं कि - अद्वैत ब्रह्म की उपासना में निरंतर रहते हुये श्री दादूजी देदीप्यमान होने लगे ॥३४॥ 
(क्रमशः)

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