बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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७. सुन्दरी श्रृंगार
https://youtu.be/5dy5DbdxA2c 
सो-धन पीवजी साज सँवारी,
अब वेगि मिलो तन जाइ बनवारी ॥टेक॥
साज शृंगार किया मन मांही,
अजहूँ पीव पतीजै नांही ॥१॥
पीव मिलन को अहिनिशि जागी,
अजहूँ मेरी पलक न लागी ॥२॥
जतन - जतन कर पंथ निहारूँ,
पीव भावै त्यों आप सँवारूं ॥३॥
अब सुख दीजे जाऊँ बलिहारी,
कहै दादू सुन विपति हमारी ॥४॥
टीका ~ हे प्रियतम प्रभो ! इस जीवात्मा को धन्य है, जिसने पतिव्रता(धन =) स्त्री की तरह, हृदय को ‘साज’ शुद्ध करके आपके स्वागत के लिये दैवी सम्पदा से सुसज्जित किया है । हे बनवारी ! हे प्रीतम ! अब विरहीजनों को जल्दी ही दर्शन दीजिये, नहीं तो आपके वियोग में यह शरीर चला जायेगा । मेरे पातिव्रत धर्म पर अभी तक आप नहीं पतीजै = विश्‍वास प्रकट नहीं किया है । मैं आप से मिलने के लिये रात - दिन प्रतीक्षा करती रहती हूँ, एक पलक भी गाफिल नींद में नहीं सो पाती हूँ । हम तो मन इन्द्रियों को अन्तःकरण में एकाग्र कर करके, आपकी प्राप्ति का मार्ग देख रहे हैं । हे प्रीतम ! जैसे आपको हम विरहीजन भावें, वैसा कहो, तो वैसे ही हम अपने आपको विरह भक्ति द्वारा सँवारें । हे प्रभु ! अब आप अपने दर्शनों का हमें सुख दीजिये, हम आपकी बार - बार बलिहारी जाते हैं । हम विरहीजनों के दुःख को अब आप सुनिये ।
शेर ~
जल शील का स्नान करके,
तिलक तन का कीजिये ।
भक्ति प्रेमा माल गल में,
साज यह सज लीजिये ।
करनी के कपड़े पहन के,
निष्कामता रंग दीजिये ।
सोलह करो श्रृंगार जिसको,
देख प्रीतम रीझिये ॥७॥

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