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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*आमेर प्रसंग (१)*
जाके हृदय जैसी होयगी, सो तैसी ले जाय ।
दादू तू निर्दोष रहु, नाम निरंतर गाय ॥१८॥
(सारग्राही अंग १७)
आमेर में मार्ग से जाते समय संतोषनाथ दादूजी को अप शब्द कहते हुये आकाश में उड़ाने को कहा । तब दादूजी कु़छ नहीं बोले किन्तु पीछे टीलाजी चल रहे थे उनको सहन नहीं हुआ तब उन्होंने कहा - दादूजी को तू नहीं उड़ा सकता किन्तु अब तूही आकाश में उड़ेगा । अपने को न उड़ने का प्रयत्न कर ले । यह कह कर उसको अपने योगबल से जिस पर वह बैठा था उस शिला के सहित ही आकाश में उड़ा दिया ।
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तब दादूजी ने टीलाजी को उक्त १८ की साखी सुनाकर कहा - तुमने यह क्या किया है । इसे नीचे उतारो दंड देना सरकार का काम है, साधु को तो सहन ही करना चाहिये । तब टीलाजी ने उसे नीचे उतार दिया । उतरते ही दादूजी के चरणों में आ पड़ा और क्षमा माँगते हुआ बोला -
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आप तो वास्तव में परम दयालु हैं इत्यादि
वचन सुन कर दादूजी ने कहा -
सो दसा कतहूँ रही, जिहिं दिशि पहुंचे साध ।
लाजों मारे संत सब, नाम हमारा साध ॥८०॥
(साँच अंग १३)
उक्त ८० की साखी संतोषनाथ को सुनाई ।
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फिर उसकी नम्रता पूर्वक विनय सुनकर उसे शिष्य बनाकर योग का अधिकारी जानकर २०९ का पद -
२०९. प्रसिद्ध साधु प्रतिपाल
बाबा ! को ऐसा जन जोगी ।
अंजन छाड़ै रहै निरंजन, सहज सदा रस भोगी ॥टेक॥
छाया माया रहै विवर्जित, पिंड ब्रह्माण्ड नियारे ।
चंद सूर तैं अगम अगोचर, सो कह तत्त्व विचारे ॥१॥
पाप पुण्य लिपै नहीं कबहूँ , द्वै पख रहिता सोई ।
धरणि आकाश ताहि तैं ऊपरि, तहाँ जाइ रत होई ॥२॥
जीवण मरण न बांछै कबहूँ, आवागमन न फेरा ।
पानी पवन परस नहिं लागै, तिहिं संग करै बसेरा ॥३॥
गुण आकार जहाँ गम नाहीं, आपै आप अकेला ।
दादू जाइ तहाँ जन जोगी, परम पुरुष सौं मेला ॥४॥
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और २२९ का पद –
२२९. जीव - उपदेश । भंग ताल
निरंजन जोगी जान ले चेला, सकल वियापी रहै अकेला ॥टेक॥
खपर न झोली डंड अधारी, मढ़ी न माया लेहु विचारी ॥१॥
सींगी मुद्रा विभूति न कंथा, जटा जाप आसन नहिं पंथा ॥२॥
तीरथ व्रत न वनखंड वासा, मांग न खाइ नहीं जग आसा ॥३॥
अमर गुरु अविनाशी जोगी, दादू चेला महारस भोगी ॥४॥
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तथा २३० का पद –
२३०. उपदेश । भंग ताल
जोगिया बैरागी बाबा, रहै अकेला उनमनि लागा ॥टेक॥
आतम जोगी धीरज कंथा, निश्चल आसण आगम पंथा ॥१॥
सहजैं मुद्रा अलख अधारी, अनहद सींगी रहणि हमारी ॥२॥
काया वन - खंड पांचों चेला, ज्ञान गुफा में रहै अकेला ॥३॥
दादू दर्शन कारण जागे, निरंजन नगरी भिक्षा मांगे ॥४॥
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उक्त पदों को सुनकर संतोषनाथजी दादूजी के शिष्य हो गये और नाम के आगे का नाथ शब्द हटाकर दास शब्द रख लिया और कहा -
दादू कर्ता आप है, समर्थ दीनानाथ ।
संतोषो छाडे नहीं, पा साधन का साथ ।
संतोष दास दादूजी के १०० शिष्यों में है ।
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