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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” २०/२२)*
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*गुरुदेव और शिष्य जिज्ञासुता ~*
होय प्रसन्न कही गुरुदेव जु,
पूरण काज भयो शिष तोही ।
जो कछु और संदेह रहे डर,
सो सबही अब बूझहु मोही ।
यों सुनि शिष्य करें विनती गुरु,
मोह मिटै भव पार जु हो ही ।
मोर सँदेह मिटाये दिये सब,
सिद्ध किया मन का मल धोही ॥२०॥
शिष्यों की श्रद्धा धारण से प्रसन्न होकर गुरुदेव ने कहा - हे शिष्यों ! अब तो तुम सबकी कामना पूर्ण हो गयी है । यदि कुछ सन्देह अवशेष है, तो पूछ लो । तब शिष्यों ने कहा - हे गुरुदेव ! हमारा सम्पूर्ण मोह मिट जावे और हम भव सागर से पार हो जावें । आपने हमारे सभी सन्देह मिटा दिये हैं, हमारे सभी मनोरथ सिद्ध कर दिये हैं, मन का सारा मैल धो दिया है ॥२०॥
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*भयहरणगिरी की महिमा युगों का स्थान ~*
एक दिनां गुरु प्रात पधारत,
दास गरीबहिं संग लिवाये ।
भय हरणा गिरि कन्दर खोलहिं,
दास गरीबहिं स्थान बताये ।
भूमि तपोमय है यह पावन,
ध्यान समाधि लगे भ्रम जाये ।
है युग त्रेतहिं को मम आसन,
भोजन नीर तरुफल पाये ॥२१॥
एक दिन प्रात: ही गुरुदेव, शिष्य गरीबदास को साथ लेकर नारायणपुर से पूर्व दिशा में स्थित भयहरण गिरि की कन्दरा में पहुँचे । वहाँ पहुँचकर शिष्य गरीबदास को अपने पूर्वकाल की तपोभूमि का स्थान बताया और कहा - यह तपोभूमि अत्यन्त पावन है, यहाँ सहज रूप से ध्यान समाधि लगती है और सारे भ्रम दूर हो जाते है । त्रेतायुग में यहाँ मेरा तपस्या - आसन रहा है, उस समय केवल तरु - फल खाकर नीर पीते हुये मैंने यहाँ तपस्या की थी ॥२१॥
(क्रमशः)

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