#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू सेवग सेवा कर डरै,
हम थैं कछु न होइ ।
तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥
दादू भीतर पैसि कर, घट के जड़े कपाट ।
सांई की सेवा करै, दादू अविगत घाट ॥
घट परिचै सेवा करै, प्रत्यक्ष देखै देव ।
अविनाशी दर्शन करै, दादू पूरी सेव ॥
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साभार : Gita Press, Gorakhpur*
भगवान् का भक्त बनने से, भगवान् के साथ अपनापन करने से, 'मैं भगवान् का हूँ' इस प्रकार अहंता को बदल देने से मनुष्य में बहुत जल्दी परिवर्तन हो जाता है | वह परिवर्तन यह होगा कि वह भगवान् में मनवाला हो जायगा, भगवान् का पूजन करनेवाला बन जायगा और भगवान् के मात्र विधान में प्रसन्न रहेगा | इस प्रकार इन चारों बातों से शरणागति पूर्ण हो जाती है |
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परन्तु इन चारों बातों में मुख्यता भगवान् का भक्त बनने की ही है | कारण कि जो स्वयं भगवान् का हो जाता है, उसके न मन-बुद्धि अपने रहते हैं, न पदार्थ और क्रिया अपने रहते हैं और शरीर अपना रहता है | तात्पर्य है कि लौकिक दृष्टि में जो अपनी कहलानेवाली चीजें हैं, जो कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली हैं, उनमें से कोई भी चीज अपनी नहीं रहती | स्वयं के अर्पित हो जानेसे मात्र प्राकृत चीजें भगवान् की ही हो जाती हैं | उनमें से अपनी ममता उठ जाती है | उनमें ममता करना ही गलती थी, वह गलती सर्वथा मिट जाती है |
(गीता-साधक-संजीवनी अध्याय ९ श्लोक ३४ की व्याख्या से)
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शरणागत भक्त 'मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं' इस भाव को दृढ़ता से पकड़ लेता है, स्वीकार कर लेता है तो उसके भय, शोक, चिंता, शंका आदि दोषों की जड़ कट जाती है अर्थात् दोषों का आधार मिट जाता है | कारण कि भक्ति की दृष्टि से सभी दोष भगवान् की विमुखता पर ही टिके रहते हैं |

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