बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

= “द्वि विं. त.” २२/२३ =


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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” २२/२३)*
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*श्री दादूजी महाराज २ हजार वर्श तपस्या की भयहरण गिरी में -*
वर्ष सहस्त्रहिं ध्यान धर्यो यहँ, 
श्री हरि नाम जप्यो सुख पाये ।
द्वापर वर्ष सहस्त्र तपै पुनि, 
शुद्ध भयो मन श्री हरि पाये ।
यों करि दोय युगों मम आसन, 
सिद्ध ॠषी गिरि कन्दर थापे ।
केतिक संत तपें यहँ गुपत जु, 
शैल तपोवन माँहिं रहाये ॥२२॥ 
एक हजार वर्ष तक श्री हरि का ध्यान स्मरण करते हुये मैंने यहाँ अत्यन्त सुख का अनुभव किया । द्वापर युग में पुन: एक हजार वर्ष तक यहाँ तपस्या की, जिससे मन शुद्ध हो गया और श्री हरि के दर्शन पाये । इस तरह यह तपोभूमि दो युगों का तपस्या स्थान है । इस पर्वत में सिद्ध ॠषि, गुप्त रूप से निवास करते हैं । कितने ही संत यहाँ तपस्या कर चुके हैं, और वर्तमान में भी इस तपोवन की कन्दराओं में गुप्त रूप से सन्त तपोरत हैं ॥२२॥ 
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*पांच हजार वर्ष नीलगिरी पर तपस्या की -* 
पाँच हजार तप्यो पुनि सागर 
मध्यहिं नीलगिरी सरसाये ।
श्री हरि आयसु पाय त्रयों पुनि, 
नागर के सुतरूप सुहाये ।
वर्ष हु साठ भयो स्वरूप जु, 
जीव अनँत उद्धार कराये ।
पंच हु पक्ष रहूं वसुधा पर, 
यों मुख आप सुनाय कहाये ॥२३॥ 
यहाँ की तपस्या के बाद कलियुग में पाँच हजार वर्षों तक मैं सागर के मध्य नीलगिरि पर तपस्या करता रहा । वहाँ श्री हरि की आज्ञा हुई, तदनुसार अहमदाबाद में नागर ब्राह्मण लोदीराम के घर मैं सुतरूप में अवतरित हुआ । अवतार के बाद अनन्त जीवों का उद्धार करते हुये यह स्वरूप साठ वर्ष की सम्य पूर्ण कर चुका है । अब मैं केवल पाँच पक्ष(महिना) तक ही इस वसुधा पर रहूँगा ॥२३॥ 
(क्रमशः)

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