बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

*चाटसू प्रसंग*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*चाटसू प्रसंग*
२०४. निज स्थान निर्णय । झपताल
मध्य नैन निरखूं सदा, सो सहज स्वरूप ।
देखत ही मन मोहिया, है तो तत्त्व अनूप ॥टेक॥
त्रिवेणी तट पाइया, मूरति अविनाशी ।
जुग जुग मेरा भावता, सोई सुख राशी ॥१॥
तारुणी तट देखि हूँ, तहाँ सुस्थाना ।
सेवक स्वामी संग रहैं, बैठे भगवाना ॥२॥
निर्भय थान सुहात सो, तहँ सेवक स्वामी ।
अनेक जतन कर पाइया, मैं अन्तरजामी ॥३॥
तेज तार परिमित नहीं, ऐसा उजियारा ।
दादू पार न पाइये, सो स्वरूप सँभारा ॥४॥
चाटसू ग्राम में कपिलमुनि को उक्त २०४ के पद से उपदेश किया था ।
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फिर २०५ का पद - २०५. झपताल
निकट निरंजन देखि हौं, छिन दूर न जाई ।
बाहर भीतर एक सा, सहजैं रह्या समाई ॥टेक॥
सतगुरु भेद लखाइया, तब पूरा पाया ।
नैनन ही निरखूं सदा, घर सहजैं आया ॥१॥
पूरे सौं परचा भया, पूरी मति जागी ।
जीव जान जीवन मिल्या, ऐसे बड़ भागी ॥२॥
रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा ।
जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥३॥
सुन्दर सो सहजैं रहै, घट अंतरजामी ।
दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥४॥
उक्त पदों के अनुसार साधना करके कपिलमुनि सिद्धावस्था को प्राप्त हो गये थे ।
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२७८. ब्रह्मयोग ताल
जाइ रे तन जाइ रे ।
जन्म सुफल कर लेहु राम रमि, सुमिर सुमिर गुण गाइ रे ॥टेक॥
नर नारायण सकल शिरोमणि, जनम अमोलक आइ रे ।
सो तन जाइ जगत नहिं जानै, सकै तो ठाहर लाइ रे ॥१॥
जरा काल दिन जाइ गरासै, तासौं कुछ न बसाइ रे ।
छिन छिन छीजत जाइ मुग्ध नर, अंत काल दिन आइ रे ॥२॥
प्रेम भगति, साधु की संगति, नाम निरंतर गाइ रे ।
जे सिर भाग तो सौंज सुफल कर, दादू विलम्ब न लाइ रे ॥३॥
चाटसू में ही एक नारायण नाम के मांगल्या गोत्र के क्षत्रिय व्यक्ति दादूजी के दर्शन करने आये थे । उनको सामने बैठे देखकर उनके अधिकार के समान उनको सचेत करते हुये उक्त २७८ के पद से उपदेश किया था । फिर वे दादूजी के शिष्य हो गये थे । डांग प्रदेश के एकलोद ग्राम में स्थायी रूप से रहे थे ।

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