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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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२०. परिचय विनती(गुजराती भाषा) । त्रिताल ~
नहीं मेल्हूँ, राम ! नहीं मेल्हूँ,
मैं शोधि लीधो नहीं मेल्हूँ,
चित्त तुम्ह सूं बांधूं नहीं मेल्हूँ ॥टेक॥
हूँ तारे काजे तालाबेली,
हवे केम मने जाशे मेल्ही ॥१॥
साहसि तूँ ने मनसों गाढो,
चरण समानों केवी पेरे काढो ॥२॥
राखिश हृदे तूँ मारो स्वामी,
मैं दुहिले पाम्यों अंतरजामी ॥३॥
हवे न मेल्हूँ तूँ स्वामी मारो,
दादू सन्मुख सेवक तारो ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि परमेश्वर का साक्षात्कार होने पर विनय कर रहे हैं कि हे राम ! मैंने अबके आपको खोज लिया है । अब मैं मन - वचन - कर्म से कभी भी आपको नहीं छोडूंगा ।
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मैं अपने चित्त को आपके चिन्तन में ही बाँधूंगा । आपका स्मरण कभी नहीं छोडूंगा । मैं आपके लिये अति व्याकुल रहता हूँ । अब आप मुझे छोड़कर कैसे जाओगे ?
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मैंने उत्साह - पूर्वक दृढ़ता से आपको पकड़ा है और आपके चरणों में समा रहा हूँ । अब आप मुझे दूर कैसे हटाओगे ?
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हे अन्तर्यामी ! मैने विरह - दुख को सहन करके बड़ी कठिनता से आपको प्राप्त किया है । आप ही मेरे स्वामी हैं, मैं आपको अपने अन्तःकरण में रखूंगा ।
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अब आपको नहीं छोडूंगा, क्योंकि आप मेरे स्वामी हैं और मैं आपका सेवक हूँ, आपके सदैव सन्मुख ही रहूँगा ।
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कृष्ण द्वारका को चले, कुन्ती कियो विलाप ।
राख लिये पुनि प्रेम वश, मेटी जन की ताप ॥२०॥
दृष्टान्त ~ धर्मनिष्ठ पांडव, भगवान् कृष्ण की कृपा से पुनः भारत का राज्य प्राप्त करके धर्म - पूर्वक राज करने लगे । तब भगवान् श्री कृष्ण ने कुन्ती जी के पास जाकर नमस्कार किया और बोले ~ भुआ जी ! अब मुझे द्वारका जाने की आज्ञा दो और जो कुछ आप चाहती हो, वह मुझ से मांग लो । नेत्रों में आंसू भरके, हृदय की प्रीति से कुन्ती जी बोली कि “हे नाथ ! हमको आपने राज दिया है, तो आपका सदैव दर्शन देओ । नहीं तो हमको फिर वनवास दे दो, क्योंकि जब हम वनवास में रहेंगे, तो आप हमें दर्शन देकर रक्षा करते रहोगे ।” ये वचन सुनकर भक्त - वत्सल भगवान् को कहना पड़ा, “हे भुआ जी ! आप आज्ञा दोगे, तभी जाऊंगा ।” तब कुन्ती जी के हृदय का विरह दुःख शान्त हुआ ।
(क्रमशः)

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