शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

= एक विं. त. ३७/३८ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“एकविंशति तरंग” ३७/३८)*
*दोहा*
*श्री दादूजी की लीला महिमा अद्भुत -* 
*दादू दीनदयालु की, लीला निज सुख चंद ।*
*जन माधव सुमिरत सदा, लहैं परम आनन्द ॥३७॥* 
*दिपै नरायण धाम में, संत सुखी गुरु संग ।*
*गुरु महिमा लीला विमल, बरणी याहि तरंग ॥३८॥* 
माधवदास जी कहते हैं कि दीनदयालु श्री दादूजी की लीलायें चन्द्र ज्योत्सना के समान सुखदायिनी है । जो जन श्रद्धा से स्मरण करते हैं उन्हें भी परम आनन्द देने वाली है । नारायणपुर के ब्रह्म धाम में संतजन श्री दादूजी के संग रहते हुये परम सुख का अनुभव करने लगे । इस तरह इस इक्कीसवीं तरंग में गुरु महिमा के साथ विमल लीलाओं का वर्णन किया गया है ॥३७ - ३८॥ 
इति माधवदास विरंचिते श्री संतगुणसागरामृत नारायणपुरे ब्रह्म धाम स्थापना ॥ इक्कीसवीं तरंग सम्पूर्ण ॥२१

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