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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९. विरह प्रीति । पंचम ताल
तैं मन मोह्यो मोर रे,
रह न सकूँ हौं राम जी ॥टेक॥
तोरे नांव चित लाइया रे,
औरन भया उदास ।
साँई ये समझाइया,
हौं संग न छाड़ूं पास रे ॥१॥
जाणूं तिलहि न बिछुटूं रे,
जनि पछतावा होइ ।
गुण तेरे रसना जपूं,
सुणसी साँई सोइ रे ॥२॥
भोरे जन्म गँमाइया रे,
चीन्हा नहीं सो सार रे ।
अजहूँ यह अचेत है,
और नहीं आधार रे ॥३॥
पीव की प्रीत तो पाइये रे,
जो सिर होवे भाग ।
यो तो अनत न जाइसी,
रहसी चरणहुँ लाग रे ॥४॥
अनतैं मन निवारिया रे,
मोहि एकै सेती काज ।
अनत गये दुख ऊपजै,
मोहि एकै सेती राज रे ॥५॥
साँई सौं सहजैं रमूँ रे,
और नहीं आन देव ।
तहाँ मन विलंबिया,
जहाँ अलख अभेव रे ॥६॥
चरण कमल चित लाइया रे,
भोरैं ही ले भाव ।
दादू जन अचेत है,
सहजैं ही तूँ आव रे ॥७॥
टीका - हे राम ! आपने हमारे विरहीजनों के मन को मोहित कर लिया है । आपके बिना हम अब इस शरीर में नहीं रहेंगे ।
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आपके नाम में हमने अपना चित्त लगाया है, औरों से अब हम उदास हो रहे हैं । हे साँई ! हे स्वामिन् ! हमको सतगुरु ने यह समझाया है कि हम अब आपका संग नहीं छोड़ें ।
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हम विरहीजन जानते हैं कि अब हम आपसे एक तिल भी अलग नहीं होंगे, तो फिर हमको पश्चात्ताप नहीं होगा । हम आपके गुणानुवाद रसना से जपें, तो आप अवश्य सुनोगे ।
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हे नाथ ! हमने अब तक भूल में मनुष्य जन्म गँवा दिया । आपके तत्व स्वरूप को हमने नहीं जाना । अभी तक भी यह हमारा मन अचेत है, परन्तु आपके सिवाय हमारा कोई भी आधार नहीं है ।
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हे मन ! परमेश्वर की प्रीति तब प्राप्त होती है जब उत्तम भाग्य उदय होता है । हे नाथ ! यह विरहीजन आपको छोड़कर अन्य की शरण नहीं जाँएगे । अब आपके चरणों में ही लगाकर रहेंगे ।
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औरों से हमने अपने मन को अलग कर लिया है । हमें तो एक आपसे ही काम हैं, क्योंकि आपको छोड़कर दूसरी जगह जाने में, जन्म - मरण रूपी दुःख उत्पन्न होता है । हे हमारे राजा ! हमको तो आप ही से काम है ।
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हे स्वामी ! आपके व्यापक स्वरूप में हम निर्द्वन्द्व होकर रमें, अब आपके सिवाय, उपास्य देव हमारा कोई दूसरा उपास्य देव नहीं है । हे अलख हमारा मन ! अब मन वाणी के अविषय आप में ही विचार द्वारा लग रहा है ।
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आपके तेज पुंज रूप चरण कमलों में हमारा चित्त - भ्रमर लगा है । हे नाथ ! आप अपने भोले भक्तों के भाव को ही ग्रहण करते हो । हे प्रभु ! हम तो अचेत हैं । आप दया करके हमारे हृदय में आप सहज में ही आइये, अर्थात् प्रकट होइये ।
लोक लाज उपहास जग, सहूँ कहै कुछ कोइ ।
मन मोहन गोहन फिरूं, जग आपन - पो खोइ ॥९॥
छन्द -
प्रीत की रीति नहीं कछु राखत,
जाति न पाँति नहीं कुलगारो ।
प्रेम के नेम कहूँ नहीं दीसत,
लाज न कान, लग्यो सब खारो ।
लीन भयो हरि से अभि - अन्तर,
आठहुँ याम रहै मतवारो ।
सुन्दर कोउ न जान सकै यह,
गोकुल गाँव को पैंडो ही न्यारो ॥९॥
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भैंस सींग भोले भज्यो, भोले भज्यो करीर ।
बक्त कुबक्त भोले भज्यो, प्रभु मिले सहज शऱीर ॥९॥
दृष्टान्त - एक भैंस चराने वाला ग्वाल, महात्मा के पास गया और बोला - महाराज ! मुझे भगवान् के दर्शन हो जावें, ऐसा नाम देओ । महात्मा बोले - राम - राम किया कर । ‘यह तो मुझे याद नहीं रहेगा ।’ ‘तो तूँ क्या काम करता है ? ‘मैं भैंस चराता हूँ, और मुझे एक भैंस के सींग बहुत अच्छे लगते हैं, वे तो मुझे याद रहते हैं ।’ महात्मा बोले - भैंस का सींग भगवान का ही नाम है, लपोना नाथ इसको खूब स्मरण कर । ‘इसके स्मरण करने से भगवान् के दर्शन हो जाएँगे ?’ महात्मा बोले - हाँ, जरूर हो जाएँगे । ‘कहाँ करूँ ?’ इस कुटिया में बैठकर स्मरण कर, अन्दर कुन्दी लगा ले, लगा "भैंस का सींग, भैंस का सींग" लपोना नाथ करने लगा । तीसरे रोज भगवान् भैंस का चेहरा बनाकर, उसकी छाती के दोनों सींग लगा दिये । गुरु जी ने आवाज दी । आंख खोली और बोला - ‘गुरु जी, भैंस के सींग अड़ते हैं ।’ जब गुरु जी ने दरवाजा खोला तो देखा, भगवान प्रकट हैं । गुरु जी बोले - जिनका तूँ ध्यान करता है । वह भगवान् यही हैं । तब बोला -
गुरु गोविन्द दोउ खड़े, किसके लागूं पांय ।
बलिहारी गुरुदेव की, गोविन्द दियो मिलाय ॥९॥
भगवान् बोले - पहले गुरुदेव को नमस्कार कर, इनकी कृपा से मैं मिला हूँ ।
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इसी प्रकार एक सु भोला महात्मा के पास गया और बोला - महाराज ! मुझे भगवान् के दर्शन होवें, ऐसा नाम बताओ । महात्मा बोले - तूँ क्या काम करता है ? ‘मैं जंगल में करीर वृक्ष की लकड़ियाँ काटा करता हूँ ।’ महात्मा बोले - तूँ करीम करीम स्मरण किया कर । वह सु बोला - ‘करीम तो याद नहीं रहेगा ।’ महात्मा ने कहा - करीर - करीर किया कर । यह भगवान् का ही नाम है । करीर करीर करता हुआ जब चल दिया । किसी ने सोचा, इसके मुर्शीद ने तो इसको करीम बताया होगा, यह करीर भजता है । तब वह सु बोला - करीर नहीं, करीम - करीम भज । तब तो भ्रम हो गया कि ‘हाय ! करीम भजूं कि करीर भजूं ।’ भगवान् प्रकट हो गये और बोले - करीम नहीं, करीर - करीर भज, तेरे गुरुदेव ने यही उपदेश किया है ।
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तीसरा दृष्टान्त - एक अ भोला व्यक्ति महात्मा के पास गया और बोला - मेरा उद्धार हो जाय, ऐसा नाम बताओ । महात्मा बोले - कभी एकान्त में बतावेंगे । एक दिन वह महात्मा जी के पीछे हो लिया । जब महात्मा जंगल में निमटने के लिये बैठे, तो वह बोला - ‘महाराज ! अब एकान्त में कृपा करो । नाम बताओ ।’ तब महात्मा ने एक ईंट का टुकड़ा उठाकर उसकी तऱफ फैंका और बोले - "वक्त देखे न कुवक्त देखे ?" भोले ने सोचा कि गुरु जी ने मंत्र बता दिया । तो उस ईंट के टुकड़े को उठा लिया और रटता हुआ चला कि "वक्त देखे न कुवक्त देखे, वक्त देखे न कुवक्त देखे", एक राजा के शहर में पहुँचा । वहाँ राजा का लड़का मर गया था । लोग रोते थे ? वह राजा के दरबार में पहुँच गया और बोला - "कैसे रोते हो ? वक्त देखो न कुवक्त देखो ।" राजा बोला - ‘मेरा लड़का मर गया ।’ भोला हाथ में सोटा रखता था । सनेथी के सोटे के मारी और बोला - ‘उठ कैसे मर गया । वक्त देखे न कुवक्त देखे ।’ लड़का जीवित हो गया । गुरु के वचन में श्रद्धा विश्वास रखने से भगवान् ने उसके वचन सत्य कर दिये । "चरण कमल चित्त लाइया रे, भोरे ही ले भाव" - भगवान् अपने भोले भक्तों का भाव ही लेते हैं और उनका कल्याण करते हैं ।
(क्रमशः)

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