शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

*प्रसाद*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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९१.(फारसी) हित उपदेश । पंचम ताल
बाबा मर्दे मर्दां गोइ, ये दिल पाक कर्दम धोइ ॥टेक॥
तर्क दुनियाँ दूर कर दिल, फर्ज फारिग होइ ।
पैवस्त परवरदिगार सौं, आकिलां सिर सोइ ॥१॥
मनी मुरदः हिर्स फानी, नफ्स रा पामाल ।
बदी रा बरतरफ करदः, नाम नेकी ख्याल ॥२॥
जिंदगानी मुरदः बाशद, कुंजे कादिर कार ।
तालिबां रा हक, हासिल, पासबाने यार ॥३॥
मर्दे मर्दां सालिकां सर, आशिकां सुलतान ।
हजूरी होशियार दादू, इहै गो मैदान ॥४॥
यह उक्त ९१ के पद से जिस तुर्क ने दादूजी के सामने गोमांस का एक बर्तन मुख बन्द करके लाकर रखा उसे दादूजी ने पू़छा - इसमें क्या है ? उसने कहा - प्रसाद है । तब दादूजी ने कहा - तुम ही इसका मुख खोलो । खोला तो उस में धृत और शक्कर मिले चाँवल निकले । तब उसकी परीक्षा करने का निश्चय पूर्ण हो गया और उसने मान लिया कि दादू उच्चकोटि के संत हैं । फिर उसकी मुसलमान धर्म से अरुचि हो गई । तब उसको दादूजी ने उक्त ९१ के पद से उपदेश दिया था ।

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