रविवार, 5 अक्टूबर 2014

= द्वि विं. त. ३/४ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” ३/४)*
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*इन्दव छन्द*
*प्रश्‍न उत्तर -* 
भूप कहे गुरुदेव इते दिन, क्यूं न मिले मम पूरब आये ।
केतिक वर्ष व्यतीत भये जग, संत बिना सब व्यर्थ गमाये ।
संत कहें सब ईश्‍वर प्रेरित, होवत काज समै जब आये ।
ज्यों वर्षा अरु और सबै ॠतु, निश्‍चित काल यथा सरसाये ॥३॥ 
हे गुरुदेव ! आप मुझे इतने दिनों बाद क्यों मिले ? आपके दर्शन पहले हो जाते तो मेरे जीवन के अनेक वर्ष सांसारिक प्रपञ्चों में व्यर्थ नहीं होते । श्री दादूजी ने फरमाया - सब कार्य ईश्‍वर - प्रेरणा से अपने समय पर होते है । जैसे वर्षा आदि ॠतुएँ अपने - अपने समय पर आती हैं, तदनुसार ही कर्म भाग्य के आधार पर विधि - प्रेरणा से ही सब कार्य संपूर्ण होते है ॥३॥ 
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*दर्शनार्थीयों की भीड़ लगी रहती है -* 
आवत भक्त चहूँ दिशि ते चलि, देश विदेश सबै जन पासा ।
सेवक संत विरक्त गृही सब, दर्शन पावत होत उल्लासा ।
आप इकंत हि ध्यान कुटी मधि, राम भजैं करि शाल निवासा ।
टील जु सेव करें धरि श्रद्धहिं, भोजन स्नान रु नीर उपासा ॥४॥ 
संत दर्शनार्थ चारों दिशाओं से भक्तजन आते रहते । देश - विदेश के सेवकों की भीड़ लगी रहती । साधु संत, सेवक विरक्त, गृहस्थी आदि सभी प्रकार के जन श्री दादूजी के दर्शन पाकर हर्षोल्लास से परिपूर्ण हो जाते । गुरुदेव तो प्राय: अपनी पर्णकुटी में ही विराजते थे, वहीं भजन ध्यान करते रहते, अत: उस पर्णकुटी का नाम भजनशाला विख्यात हो गया । गुरुदेव के भोजन स्थान जल आदि की सेवा में शिष्य टीला जी श्रद्धासहित तत्पर रहते थे ॥४॥ 
(क्रमशः)

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