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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१३. केवल विनती । गजताल
राम सँभालिये रे, विषम दुहेली बार ॥टेक॥
मंझ समंदां नावरी रे, बूडे खेवट - बाज ।
काढनहारा को नहीं, एक राम बिन आज ॥१॥
पार न पहुँचै राम बिन, भेरा भवजल मांहि ।
तारणहारा एक तूँ, दूजा कोई नांहि ॥२॥
पार परोहन तो चले, तुम खेवहु सिरजनहार ।
भव सागर में डूब है, तुम्ह बिन प्राण अधार ॥३॥
औघट दरिया क्यों तिरे, बोहिथ बैसणहार ।
दादू खेवट राम बिन, कौण उतारे पार ॥४॥
जहाज तारणे के समय उक्त १३ के पद से परमेश्वर से प्रार्थना की थी । तब परमेश्वर ने उन देवनगर के साहूकारों की जहाज को तार दिया था ।
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१६७. सद्गुरु शब्द महिमा । दादरा
शब्द समाना जो रहै, गुरु बाइक बीधा ।
उनहीं लागा एक सौं, सोई जन सीधा ॥टेक॥
ऐसी लागी मर्म की, तन मन सब भूला ।
जीवत - मृतक ह्वै रहै, गह आत्म मूला ॥१॥
चेतन चितहि न बीसरे, महारस मीठा ।
शब्द निरंजन गह रह्या, उन साहिब दीठा ॥२॥
एक शब्द जन ऊधरे, सुनि सहजैं जागे ।
अंतर राते एक सौं, सर सन्मुख लागे ॥३॥
शब्द समाना सन्मुख रहै, पर आतम आगे ।
दादू सीझै देखतां, अविनाशी लागे ॥४॥
जिस जहाज का तारा था, उस जहाज में बैठे हुये हिंगोलिगिरि और कपिलमुनि ने साहूकारों को प्रेरणा की थी कि दादूजी से प्रार्थना करो उन की कृपा से जहाज तैर जायगा । वे दोनों आमेर में दादूजी के पास आये तब उन दोनों को दादूजी ने उक्त १६७ के पद से उपदेश किया था । उक्त पद को सुनाकर दोनों को कहा - केवल भेष से कल्याण नहीं होता है । यह कहकर...
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४१४. अमिट अविनाशी रंग । धीमा ताल
रंग लागो रे राम को, सो रंग कदे न जाई रे ।
हरि रंग मेरो मन रंग्यो, और न रंग सुहाई रे ॥टेक॥
अविनाशी रंग ऊपनो, रच मच लागो चोलो रे ।
सो रंग सदा सुहावनो, ऐसो रंग अमोलो रे ॥१॥
हरि रंग कदे न ऊतरै, दिन दिन होइ सुरंगो रे ।
नित नवो निरवाण है, कदे न ह्वैला भंगो रे ॥२॥
सांचो रंग सहजैं मिल्यो, सुन्दर रंग अपारो रे ।
भाग बिना क्यों पाइये, सब रंग मांहीं सारो रे ॥३॥
अवरण को का वरणिये, सो रंग सहज स्वरूपो रे ।
बलिहारी उस रंग की, जन दादू देख अनूपो रे ॥४॥
यह भी सुनाया । तब दोनों दादूजी के शिष्य हो गये और कु़छ समय दादूजी के पास साधन का अभ्यास करके फिर हिंगोलगिरि बोकड़ास ग्राम में और कपिल मुनि गुंदैर ग्राम में स्थायी रूप से रहकर भजन करने लगे थे । ये दोनों ही दादूजी के ५२ शिष्यों में प्रसिद्ध संत हुये हैं ।
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