रविवार, 5 अक्टूबर 2014

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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
११. करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल ~
अब तो मोहि लागी बाइ, 
उन निश्‍चल चित्त लियो चुराइ ॥टेक॥ 
आन न रुचै और नहीं भावै, 
अगम अगोचर तहँ मन जाइ । 
रूप न रेख वर्ण कहूँ कैसा, 
तिन चरणों चित्त रह्या समाइ ॥१॥ 
तिन चरणों चित्त सहज समाना, 
सो रस भीना तहँ मन धाइ । 
अब तो ऐसी बन आई, 
विष तजैं अरु अमृत खाइ ॥२॥ 
कहा करूँ, मेरा वश नांही, 
और न मेरे अंग सुहाइ । 
पल इक दादू देखन पावै, 
तो जन्म जन्म की तृषा बुझाइ ॥३॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासु ! विरहीजन कहते हैं कि अब तो हमारे हृदय में विरह की वायु लगी है । उस निश्‍चल परमेश्‍वर ने हमारे दिल को चुरा लिया है । 
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अब दूसरे कर्मों में हमारी रुचि नहीं है । कोई भी साधन हमें विरह के सिवाय प्रिय नहीं लगते हैं । जो इन्द्रियों से अगोचर है, उसी अगम में हमारा मन स्थिर हो रहा है । न तो उसका कोई रूप है और जैसे हाथ पर रेखाएँ हैं, ऐसे वह अलग भी नहीं है । उसका वर्णन कैसे करें ? उसके तेज - पुंज रूपी चरणों में हमारा चित्त स्वभाव से ही समा रहा है । 
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अब तो हमारा मन उसके प्रेम रूपी रस में भीग रहा है और ऐसी प्रीति उससे हमने बनाई है, जो शब्द आदि विषयों को त्याग कर निष्काम नाम रूपी अमृत को पीते हैं । 
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अब हम क्या करें, हमारा कुछ भी वश नहीं है । हमारे हृदय में अब उसके सिवाय और दूसरा कोई भी नहीं सुहाता है । हे प्रभु ! एक पल भी हम आपका दर्शन कर सकें, तो हम जन्म - जन्मान्तरों की प्यास को बुझा लें । 
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रज्जब रुचै न राम बिन, सकल भाँति के सुख । 
भगवंत सहित भावैंहि सबै, नाना विधि के दुःख ॥११॥

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