सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

= द्वि विं. त. ५/६ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” ५/६)*
*आकाशवाणी अन्तर ध्यान के लिये -* 
यों करि मासहिं एक भये तब, 
होत निशा मधि शब्द आकाशा । 
संत स्वरूप जु वर्ष रहे इक, 
पूर्ण करो द्रुत भक्ति प्रकाशा । 
दादु कहे जब ज्यों हरि इच्छित, 
काज संवारत वो हरि दासा । 
‘ओम निरंजन राम’ जपे गुरु, 
बीत गये षट्मास सुखाशा ॥५॥ 
इस तरह एक महीना व्यतीत होने पर मध्यरात्रि को ध्यान के समय आकाशवाणी हुई कि - हे संत दादूजी ! अब आपके स्वरूप का समय एक वर्ष और शेष रहा है, अत: भक्ति ज्ञान के प्रचार का कार्य शीघ्र संपूर्ण करो । श्री दादूजी ने उत्तर में कहा - जैसी हरि इच्छा । मैं तो हरि का दास हूँ, सारे कार्य वही संपूर्ण करेंगे । यों कहकर श्री दादूजी ‘ओम निरंजन राम’ के जाप में लग गये । भजन ध्यान करते हुये छ: मास सुखपूर्वक व्यतीत हो गये ॥५॥
*भजनशाला में पूर्व संतों के दर्शन -* 
नारद गोरख दत्त दिगम्बर, 
ध्रुव प्रह्लाद शुका सनकादू । 
नाम कबीर सबै सिध साधुजु, 
आय मिले देव होत संवादू । 
आप प्रसाद सुभक्ति भई जग, 
क्यूं न चलो निज लोक अगादू । 
दादु कहे षट्मास रहे अब, 
यों हमको हरि आयसु साधू ॥६॥ 
एक रात्रि को श्री दादूजी के साथ सत्संग हेतु सिद्ध संत पधारे । नारद, गोरख, दत्तात्रेय दिगम्बर, ध्रुव, प्रहलाद, शुक्रदेव, सनकादि देव मुनि, कबीर आदि सिद्ध संत श्री दादूजी की भजन शाला में पधारे । रात्रि भर ज्ञान - सत्संग करते रहे । फिर उन्होंने कहा - हे दादूजी ! आपकी कृपा से जगत् में भक्ति ज्ञान का प्रकाश फैल गया है, अब अपने लोक में पधारो । तब श्री दादूजी ने कहा - हे साधुओ ! श्री हरि की आज्ञानुसार अभी छ: मास स्वरूप के शेष है । तत्पश्‍चात् इस लोक से प्रस्थान हो पायेगा ॥६॥
(क्रमशः)

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