सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
१२. करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल ~ 
तूँ जनि छाड़ै केशवा, 
मेरे और निवाहनहार हो ॥टेक॥ 
अवगुण मेरे देखकर, 
तूँ ना करि मैला मन । 
दीनानाथ दयाल है, 
अपराधी सेवक जन हो ॥१॥ 
हम अपराधी जन्म के, 
नखशिख भरे विकार । 
मेट हमारे अवगुणा, 
तूँ गरवा सिरजनहार हो ॥२॥ 
मैं जन बहुत बिगारिया, 
अब तुम ही लेहु सँवार । 
समर्थ मेरा सांइयाँ, 
तूँ आपै आप उधार हो ॥३॥ 
तूँ न विसारी केशवा, 
मैं जन भूला तोहि । 
दादू को और निवाह ले, 
अब जनि छाड़े मोहि हो ॥४॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज समर्थ परमेश्‍वर से, करूणा सहित विनती करते हैं, कि हे केशव ! आप अपने हेतरूपी हाथ से, हमको नहीं छोड़ देना । हमको ठेठ तक निभाने वाले आप ही हमारे स्वामी हो । 
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हे नाथ ! हमारे तन - मन के अवगुणों को देखकर आप हमसे घृणा नहीं करना, क्योंकि आप तो दीनानाथ दयाल हो और हम अपराधी सेवक जन हैं । हे बाप जी ! हम एक जन्म के नहीं, अनेको जन्मों से नख से शिखा पर्यन्त अपराधों से, विकारों से भरे हुए हैं । आप हमारे अवगुणों पर दृष्टि नहीं देना ।
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आप ‘गरवा’ नाम गहरे हो । हे सिरजनहार ! मैंने तो बहुत बिगाड़ किये हैं, अब आप ही हमारा सुधार करो । हे हमारे स्वामी । आप समर्थ हैं, आप अपनी दया से ही हमारा उद्धार करो । 
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हे केशव ! आप हमको नहीं भूलना, हम तो आपको जन्म जन्मान्तरों से भूले हुए हैं । हे स्वामिन् ! अब हम अपराधी सेवकों को निभाओ । अब हमको अध बीच नहीं छोड़ना । आपका स्वरूप साक्षात्कार कराना । (पाठान्तर - “और न वाहनहार हो) 
रज्जब सम को अधम नहिं, तुम प्रभु अधम उधार । 
उभय अंग में फेर क्या, कीजे कृपा विचार ॥१२॥ 
रज्जब पापी पृथ्वी पर, रोम रोम रचि पाप । 
कृपा करो तो उद्धरै, सेवक सुत, हरि बाप ॥१२॥
(क्रमशः)

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