गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

११. मन को अंग ~ २५

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*११. मन को अंग* 
*मन ही कै भ्रम तैं जगत यह देखियत,*
*मन ही कौ भ्रम गये जगत बिलात है ।* 
*मन ही कै भ्रम जेवरी मैं उपजत सांप,* 
*मन कै बिचारें सांप जेवरी समात है ॥* 
*मन ही कै भ्रम तै मरीचिका को जल कहै ।* 
*मन ही कै भ्रम सींपि रूपौ सो दिखात है ।* 
*सुन्दर सकल यह दीसै मन की कौ भ्रम,* 
*मन ही कौ भ्रम गये ब्रह्म होइ जात है ॥२५॥* 
*शुद्ध मन के कार्य* : मन के भ्रम के कारण ही यह जगत् चलायमान दीखता है । मन का भ्रम मिट जाने पर जगत् से उत्पन्न सभी भ्रम भी मिट जाते हैं । 
मन के भ्रम के कारण ही मनुष्य को रज्जु में सर्प की भ्रान्ति होती है । जन मनुष्य उसे सम्यग्दृष्टि से देखता है तो उसे वह रज्जुगत सर्वधर्म विनष्ट हो जाता है । 
यह मनुष्य के मन का भ्रम ही है कि उसे मरुमरिचका में जल का भ्रम होता है तथा यह भी उस के मन का भ्रम है कि उस को शुक्ति(सीपी) में रजत भासमान होता है । 
वस्तुतः यह समस्त जगत् मानव का भ्रम ही है । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं कि मन का भ्रम मिट जाने पर उस को यह समस्त जगत् ब्रह्ममय दिखायी देता है ॥२५॥
(क्रमशः)

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