सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

३०६. ज्ञान उपदेश

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३०६. ज्ञान उपदेश । त्रिताल
भाई रे, ऐसा एक विचारा, यूं हरि गुरु कहै हमारा ॥टेक॥
जागत सूते, सोवत सूते, जब लग राम न जाना ।
जागत जागे, सोवत जागे, जब राम नाम मन माना ॥१॥
देखत अंधे, अंध भी अंधे, जब लग सत्य न सूझै ।
देखत देखे, अंध भी देखे, जब राम सनेही बूझै ॥२॥
बोलत गूंगे, गूंगे भी गूंगे, जब लग सत्य न चीन्हा ।
बोलत बोले, गूंगे भी बोले, जब राम नाम कह दीन्हा ॥३॥
जीवत मूये, मूये भी मूये, जब लग नहीं प्रकासा ।
जीवत जीये, मुये भी जीये, दादू राम निवासा ॥४॥
आमेर नरेश मानसिंह कार्य का भार की अधिकता से दिन में दादूजी के दर्शन सत्संग के लिये नहीं जा सका, अतः रात को गया । सत्संग करते करते रात्रि अधिक चली गई । इससे दादूजी के शिष्य संतों को तथा राजा के सेवकों को भी निद्रा आ गई तब राजा ने कहा - मेरे सेवकों को निद्रा आ गई यह तो ठीक है किन्तु आपके शिष्य संत भी सब सो गये हैं । 
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तब दादूजी ने उक्त ३०६ का पद सुनाकर कहा - संत तो सोते हुए भी भजन ही करते हैं आपको संशय हो तो आप उच्च स्वर से बोलो फिर पता लग जायगा कि संत सोते हुये भी भजन ही करते है । राजा ने उच्च स्वर से कहा - सावधान । तब संत तो राम राम करते हुये उठे और राजा के सेवक - पकड़ो, मारो, कौन आ गया बोलते हुये उठे तब राजा ने कहा - आपका कथन यथार्थ ही है । संत सोते हुये भी भजन ही करते हैं ।

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