सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

= “द्वि विं. त.” १८/१९ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
.
*(“द्विविंशति तरंग” १८/१९)*
.
*इन्दव छन्द*
*दादूजी का भेष ब्रह्म पंथ -* 
शिष्य प्रशिष्य सभी अपने सँग, 
भद्र भये तजि भेष रु केशा ।
नौतम अम्बर देहि यथा गुरु, 
उज्ज्वल हंस ज्युं धारत वेशा ।
वाणि जु पुस्तक हाथ लिखे जन, 
साधु सुग्रन्थ बनाय विशेषा ।
यों निज भेष धर्यो धरणी पर, 
दादु दयालु हिं पांहि सुदेशा ॥१८॥ 
गुरुदेव के अनुसार अन्य शिष्य, प्रशिष्यों ने भी अपने अपने शिरों से केश उतार दिये, और नवीन चोला - टोपी धारण कर लाये । हंस के समान उज्ज्वल वेशधारी संतों ने हस्तलिखित गुरुवाणी अपने - अपने पास रख ली, इस तरह धरती पर गुरुदेव श्री दादूजी का ब्रह्मपंथ और दादूपंथी संतों की भेष परंपरा प्रचलित हुई ॥१८॥ 
.
जापि जिह्वा मन - माल बतावहिं, 
छाप मनोहरि भक्ति सु धारी ।
ज्ञान हु तिल्लक भाल सुहावत, 
व्यापक ब्रह्म उपासन पारी ।
दण्ड कमण्डलु पादुक धारहिं, 
पोथि गले बिच पानि सुझारी ।
टोपि रु चोलहिं श्‍वेत छटा लखि, 
माधवदास गुरु बलिहारी ॥१९॥ 
गुरुदेव के उपदेशानुसार जिह्वा से जाप, और मन की माला को ही अपनाया गया, हरिभक्ति रूपी छाप धारण की गई । ज्ञानरूपी तिलक ही भाल पर सुशोभित किया गया । व्यापक ब्रह्म को इष्ट मानकर उपासना मार्ग अपनाया । बाह्य आडंबर दिखावे को महत्व नहीं दिया । एक काष्ठ दण्ड, कमण्डलु और पादुका को भी धारण किया गया । हस्तलिखित गुरुवाणी को एक झोली में डालकर गले में लटकाते हुये भ्रमण करने लगे । श्‍वेत चोला टोपी की छवि देखकर माधवदास गुरुदेव की बलिहारी जाता है ॥१९॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें