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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” १८/१९)*
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*इन्दव छन्द*
*दादूजी का भेष ब्रह्म पंथ -*
शिष्य प्रशिष्य सभी अपने सँग,
भद्र भये तजि भेष रु केशा ।
नौतम अम्बर देहि यथा गुरु,
उज्ज्वल हंस ज्युं धारत वेशा ।
वाणि जु पुस्तक हाथ लिखे जन,
साधु सुग्रन्थ बनाय विशेषा ।
यों निज भेष धर्यो धरणी पर,
दादु दयालु हिं पांहि सुदेशा ॥१८॥
गुरुदेव के अनुसार अन्य शिष्य, प्रशिष्यों ने भी अपने अपने शिरों से केश उतार दिये, और नवीन चोला - टोपी धारण कर लाये । हंस के समान उज्ज्वल वेशधारी संतों ने हस्तलिखित गुरुवाणी अपने - अपने पास रख ली, इस तरह धरती पर गुरुदेव श्री दादूजी का ब्रह्मपंथ और दादूपंथी संतों की भेष परंपरा प्रचलित हुई ॥१८॥
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जापि जिह्वा मन - माल बतावहिं,
छाप मनोहरि भक्ति सु धारी ।
ज्ञान हु तिल्लक भाल सुहावत,
व्यापक ब्रह्म उपासन पारी ।
दण्ड कमण्डलु पादुक धारहिं,
पोथि गले बिच पानि सुझारी ।
टोपि रु चोलहिं श्वेत छटा लखि,
माधवदास गुरु बलिहारी ॥१९॥
गुरुदेव के उपदेशानुसार जिह्वा से जाप, और मन की माला को ही अपनाया गया, हरिभक्ति रूपी छाप धारण की गई । ज्ञानरूपी तिलक ही भाल पर सुशोभित किया गया । व्यापक ब्रह्म को इष्ट मानकर उपासना मार्ग अपनाया । बाह्य आडंबर दिखावे को महत्व नहीं दिया । एक काष्ठ दण्ड, कमण्डलु और पादुका को भी धारण किया गया । हस्तलिखित गुरुवाणी को एक झोली में डालकर गले में लटकाते हुये भ्रमण करने लगे । श्वेत चोला टोपी की छवि देखकर माधवदास गुरुदेव की बलिहारी जाता है ॥१९॥
(क्रमशः)

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