॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*११. मन को अंग*
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*जोई जोई देषै कछु सोई सोई आहि,*
*जोई जोई सुनै सोई मन ही कौ भ्रम है ।*
*जोई जोई सूंघै जोई जोई खाई जौ सपर्श होई,*
*जोई जोई करै सोई ही कौ क्रम है ॥*
*जोई जोई ग्रहै जोई त्यागै जोई अनुरागै,*
*जहां जहां जाइ सोई मन ही कौ श्रम है ।*
*जोई जोई कहै सोई सुन्दर सकल मन,*
*जोई जोई कलपै सु मन ही को ध्रम है ॥२२॥*
*मन का भ्रम* : यह(मन) जो कुछ देखता है उसी में आसक्त हो जाता है; जो सुनता है उसी को सर्वश्रेष्ठ मान बैठता है । यह उसका भ्रम ही तो है ।
जो सूँघता है, जो खाता है, जो स्पर्श करता है, अर्थात् यह जो कुह भी करता है उसी को अपना श्रेष्ठ कर्म मान बैठता है ।
जो ग्रहण करता है, जिसका त्याग करता है, जिसमें अनुराग(स्नेह) करता है, अर्थात् यह जहाँ जहाँ जाता है उस को ही अपना सर्वश्रेष्ठ श्रम मानता है ।
यह जो कुछ कहता है, उसी को 'सुन्दर' मानता है । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - विविध कल्पना करना ही मन का धर्म(स्वभाव) है ॥२२॥
(क्रमशः)

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