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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*नटवारा प्रसंग*
२२६. त्रिताल
रे मन मरणे कहा डराई, आगे पीछे मरणा रे भाई ॥टेक॥
जे कुछ आवै थिर न रहाई, देखत सबै चल्या जग जाई ॥१॥
पीर पैगम्बर किया पयाना, सेख मुसायक सबै समाना ॥२॥
ब्रह्मा विष्णु महेश महाबलि, मोटे मुनि जन गये सबै चलि ॥३॥
निहचल सदा सोई मन लाइ, दादू हर्ष राम गुण गाइ ॥४॥
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२२७. वस्तु निर्देश निर्णय । मल्लिका मोद ताल
ऐसा तत्त्व अनुपम भाई, मरै न जीवै, काल न खाई ॥टेक॥
पावक जरै न मार्यो मरई, काट्यो कटै न टार्यो टरई ॥१॥
आखिर खिरै न लागै काई, सीत घाम जल डूब न जाई ॥२॥
माटी मिलै न गगन विलाई, अघट एक रस रह्या समाई ॥३॥
ऐसा तत्त्व अनुपम कहिये, सो गहि दादू काहे न रहिये ॥४॥
नटवारे के प्रागटांक को उक्त दोनों पदों से उपदेश दिया था । फिर वह दादूजी का शिष्य हो गया था और नारायण दादूधाम में रहकर भजन किया था । वे दादूजी के ५२ शिष्यों में हैं ।
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२०७. वस्तु निर्देश । त्रिताल
तहँ आपै आप निरंजना, तहँ निसवासर नहि संजमा ॥टेक॥
तहँ धरती अम्बर नाहीं, तहँ धूप न दीसै छांहीं ।
तहँ पवन न चालै पानी, तहँ आपै एक बिनानी ॥१॥
तहँ चंद न ऊगै सूरा, मुख काल न बाजै तूरा ।
तहँ सुख दुख का गम नाहीं, ओ तो अगम अगोचर माहीं ॥२॥
तहँ काल काया नहिं लागै, तहँ को सोवै को जागै ।
तहँ पाप पुण्य नहिं कोई, तहँ अलख निरंजन सोई ॥३॥
तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी ।
सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥४॥
नटवारे से गुठले जाते समय मार्ग में एक गोझुंड ने दादुजी को घेर लिया और गायें बारंबार प्रणाम करने लगीं । इतने में किसी गो को मारकर खाने के लिये वहां एक सिंह भी आ गया किन्तु दादूजी को देखते ही उसकी गाय मारने की इच्छा तो नष्ट हो गई और वह भी गायों के समान ही मस्तक नमाकर खड़ा हो गया । तब दादूजी ने उनको उक्त २०७ का पद सुनाया था । फिर गायों ने दादूजी को जाने के लिये मार्ग दिया था और सिंह भी वहाँ से चला गया था ।
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