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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” २९/३०)*
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*सत् शिष्यों को तपोवन में तपस्या के आदेश -*
बावन शिष्य जु पंथ प्रथा रचि,
ज्ञान रु धर्महिं दो उपदेशा ।
नाम हिं लेकर श्री गुरु भाखत,
शिष्य करें परणाम सुखेशा ।
शेष सभी शत शिष्य तपोवन,
भय हरणा गिरि जाय तपेशा ।
पाय अज्ञा गुरु को कर जोरत,
संत नमो करि दूर अंदेशा ॥२९॥
तत्पश्चात् गुरुदेव ने पृथक् - पृथक नाम लेकर शिष्य संतों को आदेश दिया कि - आप बावन संत, ब्रह्म पंथ का प्रचार - प्रसार करो, ज्ञान और धर्म का उपदेश दो । शिष्यों ने बारी - बारी से प्रणाम करके गुरुदेव का आदेश शिरोधार्य किया । शेष सभी सौ शिष्यों को आदेश दिया, कि - आप सब भयहरण पर्वत के तपोवन में जाकर तपस्या करो । गुरु आज्ञा पाकर शिष्यों ने कर बद्ध नमस्कार किया । भावी कर्तव्य के विषय में सभी का सन्देह दूर हो गया था ॥२९॥
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*गरीबदास जी को जैतराम जी के लिये आज्ञा -*
दास गरीब जु पूछत हे गुरु !
आगम बात कहो कछु सूझे ।
धाम यहाँ शत वर्ष हिं भीतर,
सिद्ध हुवै इन ठाहर दूजे ।
मोर समान तपे गुरु आसन,
साधु रु संत सबै जग पूजे ।
पंथ हिं पद्धति नेम हु बाँधत,
हो जयकार भले जय गूँजे ॥३०॥
अब शिष्य गरीबदास जी ने पूछा - गुरुदेव ! आपको तो आगे की सब घटनायें प्रत्यक्षवत् भासित होती हैं, कृपया कोई आगम बात बताइये । तब गुरुदेव बोले - इस ब्रह्म धाम पर सौ वर्ष बाद एक सिद्ध महात्मा होवेंगे । मेरे ही समान गुरुगद्दी पर तपेंगे, सभी साधु संत उनकी पूजा करेंगे, वे पंथ - पद्धति के मर्यादा नियम बनायेंगे, उनकी जय - जयकार होगी ॥३०॥
(क्रमशः)

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