बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

११. मन को अंग ~ २४

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*११. मन को अंग* 
*तौ सो न कपूत कोऊ कतहूं न देखियत,*
*तौ सो न सपूत कोऊ देखियत और है ।* 
*तूं ही आप भूलि महा नीच हूं तैं नीच होइ,* 
*तूं ही आपु जाने तैं सकल सिरमोर है ॥* 
*तूं ही आपु भ्रमै तब भ्रमत जगत देखै,* 
*तेरे थिर भये सब ठौर ही कौ ठौर है ।* 
*तूं ही जीव रूप तूं ही ब्रह्म है आकाशवत,* 
*सुन्दर कहत मन तेरी सब दौर है ॥२४॥* 
*मन के सत् असत् कार्य* : रे मन ! तेरा जैसा कुपुत्र मैंने अन्यत्र कहीं नहीं देखा, न तेरे जैसा सुपुत्र ही कहीं अन्य देखा है । 
तूँ कभी अपने प्रमाद के कारण अत्यधिक हीन से हीन(पतित) बन बैठता है, या फिर कभी अपने सुकृत के कारण सर्वोत्तम(श्रेष्ठ) बन जाता है । 
तूँ स्वयं भ्रांत है, अतः तुझे यह समस्त जगत् भ्रांत(घूमता हुआ) दिखायी देता है । तूँ जब स्थिर हो जाता है तो तुझे यह जगत् भी स्थिर दिखायी देता है, तूँ ही जीवात्मा है, 
तूँ ही आकाश की तरह व्यापक ब्रह्म है । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - रे मन ! यह जगत् का भ्रम तेरी चञ्चलता(दोड़) के कारण ही दिखायी देता है ॥२४॥
(क्रमशः)

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