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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*टौंक प्रसंग*
३४१. विश्वास । उत्सव ताल
जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा ।
सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥टेक॥
गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा ।
युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥१॥
कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा ।
हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥२॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै ।
संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥३॥
जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।
दादू छिन न बिसारिये, तातैं जीवन होई ॥४॥
टौंक में सतं सम्मेलन के प्रथम दिन समुदाय को देखकर माधवकाणी दादूजी के पास गये और बोले - भगवन् ! आज मेरी लाज आप ही रख सकते हैं । दादूजी ने कहा - लाज तो सबकी भगवान् रखते हैं किन्तु आप बतावें इस समय आपको क्या कष्ट है ।
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माधवकाणी ने कहा - समुदाय को देखते हुये भोजन सामग्री अति अल्प है और पंक्ति के समय तक मैं किसी भी प्रकार इतनी सामग्री जुटा नहीं सकता । तब दादुजी ने उक्त ३४१ का पद सुनाकर उनको धैर्य दिया था । फिर भोजन सामग्री का एक थाल मँगवाकर भगवान् से प्रार्थना की - प्रभो ! आप भोग लगाकर माधवकाणी की चिन्ता दूर करिये ।
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फिर भगवान् के प्रकट होने पर दादूजी ने यह साखी -
परिचय सेवा आरती, परिचय भोग लगाय ।
दादू उस प्रसाद को महिमा कही न जाय ।
फिर वह प्रभु का भोग रूप प्रसाद भोजन सामग्री में मिला दिया था । फिर तो वह भोजन सामग्री जो एक दिन के लिये भी कम थी सात दिन तक चलती रही थी ।
परिचय भोग लगाइया, स्वामी समर्थ राम ।
सात दिवस तक जीमिया, साधू सब ही धाम ॥
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