शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

*संतों के लक्षण*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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राजा मानसिंह ने पू़छा- संतों के लक्षण क्या होते हैं ? वे भी बताइये । तब दादूजी ने १६४ का पद -
१६४. साधु लक्षण । दीपचन्दी
सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजनहार ।
भौजल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारनहार ॥टेक॥
पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम अधार ।
सुख संतोष सदा सत संजम, मति गति वार न पार ॥१॥
जुग जुग राते, जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार ।
जुग जुग मेला, जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥२॥
सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार ।
दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥३॥
संतो के लक्षण सुनकर राजा मानसिंह ने कहा- राम से मिले हुये संतों की भी कोई पहचान बतावें ।
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उक्त प्रश्‍न सुनकर दादूजी ने ३४८ का पद -
३४८. परिचय परीक्षा । पतिताल
राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै ।
जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥टेक॥
सुख दुख कबहुँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै ।
क रम को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥१॥
जागत ह्वै सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै ।
अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥२॥
काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै ।
दादू सो सब की लहै, अरु कबहुं न हारै ॥३॥
उक्त पद सुनकर राजा मानसिंह ने आमेर में एक विशाल आश्रम बनाकर उसके चलाने के लिये ग्राम भेंट करने की आज्ञा माँगी किन्तु ...
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दादूजी ने ३४५ का पद-
३४५. साच निदान । राज मृगांक ताल
हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे ।
जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥टेक॥
धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं हीं रे ।
रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥१॥
पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे ।
कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥२॥
सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे ।
नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥३॥
अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे ।
दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥४॥
उक्त पद सुनाकर अस्वीकार कर दिया ।

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