॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*११. मन को अंग*
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*हाथी कौ सौ कांन किधौं पीपर कौ पांन किधौं,*
*ध्वजा कौ उड़ान कहूं थिर न रहतु है ।*
*पानी कौ सौ घेरि किधौं पौंन उरझेर किधौं,*
*चक्र कौ सौ फेरि कोऊ कैसैं कै गहतु है ॥*
*अरहट माल किधौं चरखा कौ ख्याल किधौं,*
*फेरि खात बाल कछु सुधि न लहतु है ।*
*धूम कौ सौ धाव ताकौ राखिबे कौ चाव ऐसौ,*
*मन कौ सुभाव सु तौ सुन्दर कहतु है ॥२०॥*
*मन का स्वभाव* : कभी यह(मन) हाथी के कान के समान अल्प चञ्चलता युक्त्त, कभी पीपल के पत्ते जे समान अतिचञ्चलता युक्त्त तथा कभी ध्वजा के समान अस्थिर होता रहता है ।
यह कभी जल, कभी पवन(वायु) तथा कभी वात्याचक्र के समान यथेच्छ गतियाँ धारण करता रहता है ।
कभी अरहट के तथा कभी चरखे के चक्र के समान यह चक्कर लगाता रहता है । इस पर चढ़े बालक की तरह इस को अपनी वास्तविकता का कुछ भी ज्ञान नहीं रहता ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इस मन का स्वभाव ऐसा है कि यह कभी कभी धुएँ की उड़ान को अपनी मुट्ठी में बाँधने जैसा निरर्थक कार्य भी करने लगता है ॥२०॥
(क्रमशः)

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