शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

= “द्वि विं. त.” १५ =


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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” १)*
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*करामात का त्याग, एक ब्रह्म में रत्त -* 
परचा हो रैन दिन, दुनियां जुड़त जन,
भजन बने न कछु, प्रपंच विसारिये ।
कामना को त्याग देखि, भजन विचार पेखि,
स्वामी जी प्रसन्न नेक, गुरु वाणी धारिये
ज्ञान हु वैरागभक्ति, वेद शास्त्र सार शक्ति,
जाने मम रूप वाणी सबद विचारिये ।
गुरु वाणी हिरदै धार, जन होवें भव पार,
रामजी सहाय करें संशय निवारिये ॥१५॥ 
शिष्य गरीबदास जी ने कहा - हे गुरुदेव ! आपका स्वरूप तो तेज:स्वरूप है, इसको रख लेने से हमारी कार्य सिद्धि तो हो जावेंगे, किन्तु ऐसी अद्भुत करामात देखकर जगत - जनता की भीड़ इस धाम की तरफ दौड़ने लगेगी, और लोग कहेंगे कि - दादूपंथी शव उपासक हैं, प्रेत पूजा करते है । इस तरह निन्दा ही होगी । 
तब श्री दादूजी ने कहा - मेरे द्वारा प्रदत्त यह दिव्य दीपक रख लो । इस अखण्ड ज्योति वाले दीपक से प्रश्‍नोत्तर करके अपने कार्य पूरे करते रहना । बिना तेल बाती का यह दीपक सदा प्रज्वलित रहेगा । 
गुरुदेव की बात सुनकर गंभीर विचार के बाद गरीबदास जी बोले - हे सिद्ध गुरुदेव ! ऐसे दिव्य दीपक की उपासना से लोग हमें शक्ति उपासक समझेंगे । इस दीपक के परचे चमत्कारों के कारण दुनियाँ की भीड़ जुड़ेगी, प्रपञ्च का विस्तार होगा, जिससे भजन ध्यान स्मरण में सदैव विघ्न होता रहेगा ।
गरीबदास जी एवं अन्य शिष्य संतों की ऐसी त्याग भावना, कामना - निवृत्ति तथा भजन - ध्यान में दृढ़ वृत्ति देखकर प्रसन्न स्वामी श्री दादूजी ने फरमाया - तो फिर उस उपदेशों के संग्रह, अनुभव वाणी को मेरा ही स्वरूप मानकर धारण कर लो । ज्ञान वैराग्य और भक्ति की प्रेरणा देने वाली यह वाणी, सम्पूर्ण वेद तथा शास्त्रों का सार है । गुरुवाणी के शब्दों पर दृढ श्रद्धा विश्‍वास के साथ विचार करोगे, तो रामजी तुम्हारे सारे संशय दूर कर देंगे, प्रतिपल सहायता करेंगे । जो भी श्रद्धालु जन गुरुवाणी को हृदय में धारण करेगा, वह भव से पार हो जावेगा ॥१४ - १५॥ 
(क्रमशः)

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