रविवार, 5 अक्टूबर 2014

११. मन को अंग ~ १४

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*११. मन को अंग*
.
*कौन सुभाव पर्यौ उठि दौरत,*
*अमृत छाड़ि चचोरत हाडै ।* 
*ज्यौं भ्रम की हथिनी दृग देखत,*
*आतुर होइ परै गज खाडै ॥* 
*सुन्दर तोहि सदा समुझावत,*
*एक हु सीख लगै नहिं रांडे ।* 
*बादि वृथा भटकै निस-बासर,*
*रे मन ! तूं भ्रमबौ किन छांडै ॥१४॥* 
रे मन ! तेरा यह कौन स्वभाव पड़ गया कि तूँ अमृत फल को छोड़कर हड्डियों को चूसने में ध्यान लगा रहा है ! 
जैसे कोई कामोन्मत्त हाथी किसी हथिनी की पुतली(प्रतिमा) को देखने के बाद उस को वास्तविक हथिनी समझ कर उसके पीछे दौड़ता हुआ उसके बन्धन के लिए खोदे गये गड़हे(गर्त) में जा गिरता है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - मैं तुझे इतना समझाता रहता हूँ परन्तु तुझे मेरी दी हुई यह शिक्षा उसी तरह प्रभावित नहीं कर पाती; जैसे किसी रंडवै(विधुर) पुरुष के लिये ब्रह्मचर्य(परदारगमननिषेध) की शिक्षा निरर्थक हो जाया करती है । 
अरे ! तूँ यह दिन रात व्यर्त इधर उधर घूमना क्योँ नहीं छोड़ देता ! ॥१४॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें