शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

= “च. विं. त.” ११/१२ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्विंशति तरंग” ११/१२)*
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*भोजन व्यवस्था ~*
दास गरीब महाबुद्धिसागर, 
ईश्‍वर के ॠधि भोग लगाई ।
ॠद्धि रु सिद्धि हजूरि खड़ी ढिग, 
आय गजानन वास कराई ।
सादर भाव रखे बहु व्यंजन, 
पाँत भई सबके मन भाई ।
आदर मान कियो सबको मन, 
पातल पाँतहि माँहिं फिराई ॥११॥ 
बुद्धि के सागर गरीबदास जी ने सर्वप्रथम निर्मित भोजन सामग्री का ईश्‍वर के प्रति भोग लगाया । उनकी प्रार्थना पर ॠद्धि सिद्धि के साथ श्री गणेश श्री भण्डार में विराजमान हो गये । पश्‍चात् आदर के साथ भोजन पंक्ति की प्रार्थना की गई । सभी साधु संत पंक्ति बनाकर बैठ गये । विशिष्ट साधु संन्तों को यथोचित सम्मान देते हुये आदरपूर्वक आसन दिये गये । तत्पश्‍चात् पातल का वितरण किया गया ॥११॥ 
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*भंडार में अटूट रिद्धि ~*
पुर्सत संत भलीविध व्यंजन, 
लेत अज्ञा सब भोजन पाई ।
छाब गही मनुहार करी अति, 
संतन को भली भाँति जिमाई ।
ले गये संतबंधी गठियाभर, 
आसन पर लइ जात मिठाई ।
टूटत नाहिं अटूट भई ॠधि, 
खूटत नाहिं अखूट रहाई ॥१२॥ 
ईश्‍वर एवं गुरुदेव की जयघोष के साथ निर्मित विविध व्यंजन परोसे गये । प्रमुख संतों की आज्ञा लेकर नोबत घोष के साथ भोजन प्रारम्भ हुआ । रुचिपूर्वक साधु संत जीमने लगे । हाथों में सामग्री की छाब लेकर सेवक जन मनुहार करने लगे । सभी संतों को प्रीतिपूर्वक भोजन कराया गया । भोजन के पश्‍चात् प्रत्येक साधु को गांठ बाँधकर मिठाई दी गई, जिसे वे अपने - अपने आसनों पर ले गये । ईश्‍वर कृपा से सामग्री अटूट रही । खूब बाँटने पर भी अखूट ही रही ॥१२॥ 
(क्रमशः)

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