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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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४७. विश्वास । नटताल ~
साहिबजी सत मेरा रे,
लोग झखैं बहुतेरा रे ॥टेक॥
जीव जन्म जब पाया,
मस्तक लेख लिखाया रे ॥१॥
घटै बधै कुछ नांही,
कर्म लिख्या उस माहीं रे ॥२॥
विधाता विधि कीन्हा,
सिरज सबन को दीन्हा रे ॥३॥
समरथ सिरजनहारा,
सो तेरे निकट गँवारा रे ॥४॥
सकल लोक फिर आवै,
तो दादू दीया पावै रे ॥५॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव अपना परमेश्वर में विश्वास दिखा रहे हैं कि हे भाईयों ! हमें तो एक सत्यस्वरूप परमेश्वर का ही आश्रय है और सांसारिक लोग तो अपना धन, जन, बल का आसरा लेकर बहुत खींचातानी में लगे रहते हैं ।
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हे भाई ! जिस दिन जीव ने जन्म लिया है, तभी से इसका प्रारब्ध - कर्म, इसके साथ है । वैसा ही सुख - दुःख, या प्राप्ति - अप्राप्ति होती रहती है । उस प्रारब्ध - कर्म में, न्यूनाधिक भाव कुछ नहीं होता है ।
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समर्थ परमेश्वर, सब को उत्पन्न करने वाला, अन्तःकरण में जीव के पास ही है, परन्तु ये गँवार जीव उसको नहीं देखता है । हे मूर्ख ! चाहे तूँ सम्पूर्ण लोकों में फिर आवे, तो भी तेरे प्रारब्ध - कर्मानुसार ही परमेश्वर तुझको देंगे, वही तुझको मिलेगा ।
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दिया मिले परलोक में, कर्ण तन गति जोइ ।
कंचन दत्त कंचन लह्यो, अवर मिल्यो नहिं कोइ ॥४७॥
दृष्टान्त ~ इस लोक में जो कुछ हाथ से देता है, वही परलोक में मिलता है । राजा कर्ण ने सोने का दान दिया था, तो परलोक में उसको सोना ही मिला । फिर धर्मराज की आज्ञा से मृतलोक में आकर सोलह रोज तक अन्न, वस्त्र, जल आदि का दान किया, तब फिर उसको सम्पूर्ण पदार्थ प्राप्त हुए । उसी दिन से सोलह श्राद्ध भी दुनियां में सभी लोग करने लगे ।
दियो लियो दफ्तर चढै, छाजन भोजन रोक ।
जगन्नाथ दरबार में, मिलै थोक का थोक ॥४७॥
My Lord alone is Truth; let people
wear themselves out in various other pursuits.
When a person was given birth,
his destiny was marked on his forehead.
It doesn’t increase or decrease;
all karmas are written there.
All arrangements has the Creator made,
and all being did He create.
The Creator is almighty, and He is near you,
O foolish one.
Even if you wander round the whole world,
you shall obtain only your recompense, O Dadu.
(English translation from "Dadu~The Compassionate Mystic"
by K. N. Upadhyaya~Radha Soami Satsang Beas)

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