शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

*खाटू प्रसंग*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*खाटू प्रसंग*

१९७. निज मार्ग निर्णय । चौताल
मैं पंथी एक अपार का, मन और न भावै ।
सोई पंथ पावै पीव का, जिसे आप लखावै ॥टेक॥
को पंथी हिंदू तुरक के, को काहू राता ।
को पंथी सोफी सेवड़े, को सन्यासी माता ॥१॥
को पंथी जोगी जंगमा, को शक्ति पंथ ध्यावै ।
को पंथी कमड़े कापड़ी, को बहुत मनावै ॥२॥
को पंथी काहू के चलै, मैं और न जानूं ।
दादू जिन जग सिरजिया, ताही को मानूं ॥३॥
ईडवा से बीकानेर नरेश रायसिंह ने दादूजी को अति श्रद्धा से बुलाया था । किन्तु फिर उसके गुरु गोकुलिये गुसांई ने रायसिंह को बहकाया तब उसको अश्रद्धा हो गई । दादूजी को लेने गया था उसके साथ दादूजी शिष्यों के सहित खाटू पधार गये । जब राजा के पास गये तब राजा रायसिंह ने गोकुलिये गुसांयों के बहकाने से दादूजी से पू़छा - तुम्हारा धर्म क्या है ? व्यवहार कैसा है ? कर्तव्य किया है, वही हमारा कर्तव्य है और कथन हमारा सब के प्रति यही है कि सब अपने मन की वृत्ति परब्रह्म में लीन करो । राजा ने फिर पू़छा - तुम्हारा पंथ कौन है ? तब दादूजी ने उक्त १९७ का पद सुना दिया । राजा रायसिंह ने फिर पू़छा - उस पंथ का स्वरूप क्या है ? तब दादूजी ने....
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६६. नटताल
भाई रे ऐसा पंथ हमारा,
द्वै पख रहित पंथ गह पूरा,अवरण एक अधारा ॥टेक॥
वाद - विवाद काहू सौं नांहीं, माहीं जगत तैं न्यारा ।
सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आप ही आप विचारा ॥१॥
मैं तैं मेरी यहु मति नाहीं, निर्वैरी निरकारा ।
पूरण सबै देख आपा पर, निरालंब निरधारा ॥२॥
काहु के संग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा ।
मनहीं मन सौं समझ सयाना, आनन्द एक अपारा ॥३॥
काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा ।
इहि पथ पहुँच पार गह दादू, सो तत सहज सँभारा ॥४॥
सुना दिया । फिर राजा का यह प्रश्‍न तुम किस देव की पूजा करते हो ?
इसका उत्तर देने को और भ्रमनाशक उपदेश देने की १९५ का पद -
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१९५. भ्रम विध्वंसण । प्रतिताल
जग अंधा नैन न सूझै, जिन सिरजे, ताहि न बूझै ॥टेक॥
पाहण की पूजा करै, करै आतम घाता ।
निर्मल नैन न आवई, दोजख दिशि जाता ॥१॥
पूजै देव दिहाड़ियां, महा - माई मानैं ।
प्रकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥२॥
भैरुं भूत सब भ्रम के, पशु प्राणी ध्यावैं ।
सिरजनहारा सबन का, ताको नहिं पावैं ॥३॥
आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करही ।
दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥४॥
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दादूजी के उक्त विचार राजा के मन में नहीं ठहर सके कारण उसके मन में दूषित विचार भर दिये गये थे । पुनः गोकुलिये गुसांइयों ने राजा को कहा - दादू तुलसी आदि की माला न रखे तो तुम उसे सोने के मणियां की माला दे दो । सोने के लोभ से ले ही लेगा । राजा ने सोने की माला देने का आग्रह किया । तब दादूजी ने अस्वीकार करके कहा -
सुध बुध जीव धिजाय कर, माला संकल वाहि ।
दादू माया ज्ञान से, स्वामी बैठा खाय ॥
(भेष अंग १४)
राजा ने कहा था यह मेरी आज्ञा मान ही लो । दादूजी ने कहा - आज्ञा तो मैं विश्व के राजा परमात्मा की ही मानता हूँ । यह कहकर ३९१ का पद -
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३९१. समर्थ लीला । तिलवाड़ा
ऐसो राजा सेऊँ ताहि, और अनेक सब लागे जाहि ॥टेक॥
तीन लोक ग्रह धरे रचाइ, चंद सूर दोऊ दीपक लाइ ।
पवन बुहारे गृह आँगणां, छपन कोटि जल जाके घरां ॥१॥
राते सेवा शंकर देव, ब्रह्म कुलाल न जानै भेव ।
कीरति करणा चारों वेद, नेति नेति न विजाणै भेद ॥२॥
सकल देवपति सेवा करैं, मुनि अनेक एक चित्त धरैं ।
चित्र विचित्र लिखैं दरबार, धर्मराइ ठाढ़े गुण सार ॥३॥
रिधि सिधि दासी आगे रहैं, चार पदारथ जी जी कहैं ।
सकल सिद्ध रहैं ल्यौ लाइ, सब परिपूरण ऐसो राइ ॥४॥
खलक खजीना भरे भंडार, ता घर बरतै सब संसार ।
पूरि दीवान सहज सब दे, सदा निरंजन ऐसो है ॥५॥
नारद गावें गुण गोविन्द, करैं शारदा सब ही छंद ।
नटवर नाचै कला अनेक, आपन देखै चरित अलेख ॥६॥
सकल साध बाजैं नीशान, जै जैकार न मेटै आन ।
मालिनी पुहुप अठारह भार, आपण दाता सिरजनहार ॥७॥
ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि ।
दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥८॥
(खाटू प्रसंग-क्रमशः)

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