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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*डीडवाना प्रसंग*
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१३७. उपदेश । त्रिताल
सजनी ! रजनी घटती जाइ ।
पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनो लाल मनाइ ॥टेक॥
अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु अवसर चलि जाइ ।
यहु तन विछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछे ही पछिताइ ॥१॥
प्राण - पति जागे सुन्दरि क्यों सोवे, उठ आतुर गहि पाइ ।
कोमल वचन करुणा कर आगे, नख शिख रहु लपटाइ ॥२॥
सखी सुहाग सेज सुख पावै, प्रीतम प्रेम बढ़ाइ ।
दादू भाग बड़े पीव पावै, सकल शिरोमणि राइ ॥३॥
किरडोली से डीडवाना का गोपालदास माहेश्वरी दादूजी को डीडवाने ले आया और वहां सत्संग का लाभ लोग लेने लगे । एक दिन गोपलदास कु़छ जिज्ञासा से दादूजी के सामने बैठा था । दादूजी ने उसके मन का भाव जानकर उक्त १३७ के पद से उसे उपदेश दिया था । उक्त उपदेश से उसकी बुद्धि प्रभु में लगी थी ।
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११५. चेतावनी । पंचम ताल
भाई रे यूं विनशै संसारा, काम क्रोध अहंकारा ॥टेक॥
लोभ मोह मैं मेरा, मद मत्सर बहुतेरा ॥१॥
आपा पर अभिमाना, केता गर्व गुमाना ॥२॥
तीन तिमिर नहिं जाहीं, पंचों के गुण माहीं ॥३॥
आतमराम न जाना, दादू जगत दीवाना ॥४॥
डीडवाने में एक नागौरी गोपाल जोशी थे । उनकी दादूजी में बहुत श्रद्धा थी । उन्होंने दादूजी से पू़छा - स्वामिन् ! संसार के प्राणी बारंबार क्यों मरते हैं ? प्रभु का भजन करके प्रभु को क्यों नहीं प्राप्त होते हैं ? तब दादूजी ने उक्त ११५ का पद सुनाकर उत्तर दिया था । गोपाल भी सुनकर संतुष्ट हुये थे ।
(क्रमशः)

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